तुम्हारी हथेली की लकीरों पर
मैंने अपने अस्तित्व के बीज़
छोड़ रखे हैं.
तुम्हारी हँसी
एक कुएँ में घुली चाशनी है.
हर सुबह उतरता धुँधलका
तुम्हारी आँखों की चिड़ियों की
जोहता है बाट.
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Wednesday, July 05, 2023
Friday, February 18, 2022
चलो प्रेम करें
चलो प्रेम करें.
एक दूसरे की झुंझलाहट झेल चुकने के बाद
अहम को दें तिलांजलि
और गले मिल
घंटों रोएँ
प्रेम में जब आ जाए
सच कहने की ताकत- सुनने का हौसला
और बनावटीपन हो दरकिनार
तब
एक-दूजे को अनकहे निहारते हुए
चलो प्रेम करें।
तुम्हें बुरा लगे
मुझ कवि का कुछ न लिखना,
मुझे लगे अजीब
तुम्हारा अचानक कभी
कुछ भी न लगना अजीब.
हम बच्चों को संभालते, संवारते
जब बस दर्ज करते रहें अपनी उपस्थितियाँ,
तब किसी लम्हे
तुम या मैं
हो जाएं शरारती
और पूछें, बताएँ, आदेश दें
कि
चलो प्रेम करें।
क्या कहती हो?
Saturday, September 05, 2015
मेरे माधो
मेरे माधो बिछड़े जो उधो रे, मैं तो हुई बावरी,
जोगन बनी बिफरूँ मैं सखे पर, जोगी हुए क्या वो भी?
सच-सच बता,
बंशीवाला
फफक के यूँ रोए? गश ऐसा खाए?
हिलें-मिलें सबसे वो वहाँ पे, हँसी-ठट्ठा खूब हीं,
सूखा-सूखा पतझड़ है यहाँ पे, बची जली दूब हीं,
माटी चुभे,
अपनी मुझे,
जिऊँ मैं कैसे जो, बैरी भए माधो...
जाके कहो उनसे कि भले हीं लीला रचें लाखों संग,
बंशी टेरें मथुरा में मगर जब, रंगें दो लब मेरे रंग,
साँसें वो लें,
मेरे हीं से,
देखें बिरज मुझमें, चाहे नहीं आएँ..
- Vishwa Deepak Lyricist
Wednesday, March 04, 2015
हमारा शुद्ध-रूप है वह
तुम सीपी हो या शंख,
या हो असंख्य
मेरे अंदर..
.
तुमने जना है जिसे
वह मेरी हर ’कृति’ से विशाल है,
वह नोंक है कलम की,
सौंदर्य है सृष्टि का,
मेरे अंतस का सुर-ताल है...
.
हम दोनों का अंश?
या फिर
भविष्य की इस निधि
के अंश हैं हम?
हमारा शुद्ध-रूप है वह
और अपभ्रंश हैं हम...
.
शुक्रिया!
स्वाति, सीपी, शंख..
शुक्रिया असंख्य
इस अमृत के लिए...
.
हम दोनों अब
अणु बन
इस अमृत में पिघलेंगे...
- Vishwa Deepak Lyricist
Sunday, May 18, 2014
साल भर पुरानी वह बात
साल भर पुरानी वह बात,
जिसकी उम्र महज एक साल है-
बड़ी हीं ताजी है।
मेरी ’बुक-सेल्फ’ की सबसे बोरिंग किताब में भी
भर गई थीं रंगीनियां...
आबाद हो चले थे
दिन-रात के कई ’अनाथ’ हिस्से..
नींद हो चली थी साझी
और ख्वाब पूरे..
अब बेफिक्री फिक्र देती थी
और फिक्र का बड़ा-सा बंडल
उतर गया था किन्हीं ’और’ दो आँखों में..
मेरे नाम के मायने भी बदल गए थे शायद..
तभी तो
भले पुकारा जाऊँ सौ बार;
चिढता न था...
सच में-
साल भर पुरानी वह बात,
जिसकी उम्र महज एक साल है-
बड़ी हीं ताजी है।
और हर पल जवां रखा है इसे
तुमने...
बस तुमने!!!
- Vishwa Deepak Lyricist
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Sunday, March 09, 2014
तुम्हारा मौन
आँखें मूंदो और महसूस करो -
ज़िंदगी तुम्हारे दो शब्दों के बीच के अंतराल में
कुलाचें भर रही है,
खिड़कियाँ खुली हैं आमने-सामने की
और
बहुत कुछ अनकहा गुजर रहा है
दीवारों की सीमाएँ तोड़कर..
मैंने कुछ कहा नहीं है,
फिर भी
ध्वनियों की अठखेलियाँ हैं तुम्हारे सीने में
और
तुम्हारा मौन जादूगर-सा
शून्य से उतार रहा है शब्द
टुकड़ों में...
आँखें मूंदो और महसूस करो-
गले के इर्द-गिर्द छिल रही है
शब्दों की चहारदीवारी
और
कई अहसास सशरीर पहुँच रहे हैं
तुम्हारे-मेरे बीच...
सुनो!
संभालकर रख लो इन्हें...
ये अपररूप हैं प्रेम के.....
इन्होंने मृत्यु को जीत लिया है!!!
- Vishwa Deepak Lyricist
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Monday, February 24, 2014
तुम्हारा आना
सफेद झूठ होगा मेरा यह कहना कि
तुम्हारे आने से पहले
दिन खाली-खाली थे और रातें सूनी;
यह कहना कि
तुम्हें जानकर हीं मैंने जाना हैं ज़िंदगी को,
कि तुम आई
तभी धड़कनें उपजीं, साँसें कौंधीं, रगों में रक्त बह निकला...
मेरे शब्द गिर पड़ेंगे
कौड़ियों की तरह,
अगर मैं बोल दूँ कि
तुमने हीं हाड़-माँस में फूँके हैं प्राण...
यादों पर पड़े पदचिन्ह गवाही देंगे
कि मैं तुम्हें रख रहा हूँ धोखे में..
तुम कभी न कभी गुजरे नक्षत्रों को उतारोगी हथेली पर
और किस्मत की लकीरों पर दौड़ पड़ोगी उलटे पाँव..
टकराओगी सच से
और पिघल जाएगा मेरे सच का मोल..
इसलिए खुद कहता हूँ-
तुम्हारे आने से पहले भी
ज़िंदा था मैं,
जान चुका था ज़िंदगी के उतार-चढाव..
ज़िंदा था मैं,
लेकिन सुलगती साँसों की आंच पर चढे काठ की हांडी के मानिंद..
मेरे दिन लबरेज थे चंद तारों से
और रातों में जलन थी दावानल की;
दर-ओ-दीवार नाखूनों की छीलन से नुचे-खुचे थे
और सीने में बसते थे......... बस ज्वार-भाटे
तुमने प्राण नहीं फूँके,
बल्कि पेट के बल सरकते मेरे अस्तित्व में
जड़ दी है रीढ...
प्रेम की रीढ..
शून्य से ऊपर खींच ले जाना अगर प्रेम है
तो अनंत तक धंस चुके मेरे ख्वाबों को तुम्हारा अवलंब
क्या कहा जाएगा-
युग निर्धारित करे!!!
- Vishwa Deepak Lyricist
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Sunday, August 04, 2013
देह नया है
वही धूप,
वही परछाई..
देह नया है... लेकिन अब
वही उम्र,
ज़रा अलसाई..
नेह नया है... लेकिन अब
लफ़्ज़ वही हैं,
वही हैं मानी,
सोए पड़े थे
ये अभिमानी..
अब जाग गए हैं... सब के सब..
देह नया है... देखो अब
- Vishwa Deepak Lyricist
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Thursday, March 14, 2013
एक छटांक सूरज
मुँह अंधेरे
आँखों का आबनूसी रंग
उड़ेल दिया
मेरी उतरती पलकों पर..
शर्म से गुलाबी हो गए गाल
और लब सुर्ख..
तुमने डिंपलों में डुबोई
अपनी उंगलियाँ
और एक छटांक सूरज निकालकर
भर दी मेरी मांग..
एक बार फिर
फैल गया फागुन
चारों ओर..
काश!
हर दिन की होली यूँ हीं बनी रहे...
आमीन!!!!
- Vishwa Deepak Lyricist
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Tuesday, January 22, 2013
ज़ेरोक्स करके रख लूँ मैं
आपकी बदमाशियाँ ज़ेरोक्स करके रख लूँ मैं..
आईये
कुछ बोलिये,
आँखों को मेरी खोलिये,
मुझको खिलौना कीजिए,
हाथों से टोना कीजिए..
पलकों पे साँसें मारिये,
कानों में झांसे मारिये,
मैं टोकूँ तो हँस दीजिए,
जो बोलूँ कि बस कीजिए
तो रूठ के चल दीजिए..
फिर लौट के खुद आईये
और आते हीं भिड़ जाईये...
आईये
आ जाईये,
आपकी बदमाशियाँ ज़ेरोक्स कर के रख लूँ मैं..
ख्वाब में आती है जो
आपकी हमनाम एक
आप-सी दिखती तो है
पर हैं हुनर उन्नीस हीं..
बीस तो बस आप हैं..
ख्वाब के उस ’आप’ को
आप करने के लिए
आईये
आ जाईये,
आपकी बदमाशियाँ ज़ेरोक्स कर के रख लूँ मैं..
देखिए,
साँस की खुराक का सवाल है!!
- Vishwa Deepak Lyricist
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xerox
Monday, January 21, 2013
सोने दो इसे
ज़रा-सी आँख लगी है,
सोने दो
इसे..
तुम अपनी हवाओं की बांसुरी
फूंको
पहाड़ों के कानों में,
रोशनी के छींटे उड़ेल आओ
फूलों पे
गुलमोहर के,
जाकर निहारो एक-टक
रात भर बतियाते
मस्जिद-मंदिर के गुंबदों को,
पाँव चूमो
नीम-नींद में डूबी
गिलहरियों के -
तुम्हारी रचनाएँ तो वे भी है,
जाओ
उन पर नाज़ करो
इस वक़्त..
माँग लो
गौरैये से उसके पंख
और पहली उड़ान की तरह
निकल जाओ क्षितिज नापने..
निश्चिंत रहो-
तुम्हारी यह कविता
कर रही है मेरी डायरी में आराम..
मुझे प्यार पढने दो..
तुम आना कल सुबह
सूरज के साथ
और गुनगुना लेना इसे
गुनगुनी धूप की गिलौरी निगलकर..
तब तक
सोने दो इसे,
ज़रा-सी आँख लगी है!!!
- Vishwa Deepak Lyricist
मेरी हूर
सोयी हूरें
नहीं मिलती किताबों में भी..
सबको देखनी होती हैं
उनकी
घूरती आँखें,
घेरती बांहें
और थिरकते पाँव...
वे सारी हूरें
अभिशप्त हैं जागने के लिए
क्योंकि सोयी हैं
उनके मुरीदों की कल्पनाएँ..
मेरी हूर
सोयी है
सामने
और मैं रंगता जा रहा हूँ सफ़हे,
हज़ारों हज़ार सफ़हे -
उसके चेहरे पे,
अपने सीने में...
कविताएँ
उठकर बैठ रही हैं हर पल,
हुस्न जाग रहा है,
हूर सोयी है..
कवि ज़िंदा है!!!
- Vishwa Deepak Lyricist
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Friday, January 18, 2013
ज़िंदगी आपकी ज़मीन पर है चल पड़ी
ज़िंदगी जुए से है निकल पड़ी,
ज़िंदगी धुएँ से है निकल पड़ी..
ज़िंदगी अब होश में है,
आपकी ज़मीन पर चल रही है,
जोश में है..
फूल के लिबास में,
ओस के कयास में,
खुशबूओं से खेलती
जूही, अमलतास में,
ज़िंदगी
धूप की छुअन से है मचल पड़ी...
ज़िंदगी लिजलिजी धुंध से निकल पड़ी..
ज़िंदगी अशर्फ़ी हुई कारण आपके,
रूह में मिलाकर देह को खिला दूँ,
अनमोल बर्फ़ी हुई कारण आपके...
आपके..
ज़िंदगी आपकी आँख में है ढल पड़ी..
हारे हुए जुए से जीतकर निकल पड़ी,
काले हुए धुएँ से बीतकर निकल पड़ी,
ज़िंदगी आपकी ज़मीन पर जो चल पड़ी...
ज़िंदगी..
- Vishwa Deepak Lyricist
Sunday, January 13, 2013
तुम्हारी मुहर लगी साँसें
वो तुम्हारे लबों से "हाय, मर जावां" का फूटना
और मेरा मर जाना.. उसी दम...
याद रहेगा मुझे आवाज़ों का दौर गुजर जाने के बाद भी..
तुम बस इन छल्लेदार लबों से चूमती रहना हवाएँ,
मैं तुम्हारी मुहर लगी उन साँसों की बदौलत जीता-मरता रहूँगा...
बस तुम इशारों के उस दौर में मत भूलना
"हाय" कहना आँखों से,
मैं पढ लूँगा तुम्हारी अदाएँ टटोलकर "ब्रेल लिपि" में
और
और
मर जाऊँगा फिर से.......उसी दम
- Vishwa Deepak Lyricist
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Tuesday, January 08, 2013
ओक भर की आँख में
नाटे कद की ज़िंदगी
फैलती है जा रही..
आसमां से बोल दो
नए रिश्ते ना बाँधा करे,
हाथ की ऊँचाई अब
है देह को छका रही..
नाटे कद की ज़िंदगी..
शाम की ढलान पे
हैं सुर्ख लब सिमट रहे,
ओक भर की आँख में
है रात छलछला रही..
नाटे कद की ज़िंदगी..
वो वहीं से बिन कहे
लौट गए आज भी,
हमने "प्यार" सुन लिया,
अब साँस बड़बड़ा रही..
नाटे कद की ज़िंदगी,
फैलती है जा रही...
- Vishwa Deepak Lyricist
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tanha,
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zindagi
Thursday, January 03, 2013
दादी जी
पोरों में बर्फ जम जाए
तो टूट जाता है पत्थर भी,
कट-कटा उठते हैं दाँत लोहे के
जब सर पर काबिज़ होता है कुहासा...
फिर वह तो एक सौ-साला इमारत थी..
हाय!
छत उठ गई पोते-पोतियों के सर से,
भगवान घर की आत्मा को शांति दे...
- Vishwa Deepak Lyricist
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Wednesday, December 05, 2012
उस तरह का प्यार
मैं तकरीबन हर उस किसी को प्यारा हूँ
जो मुझे "उस तरह" प्यार नहीं करती..
और जो करती थी बातें मुझे "उस तरह" प्यार करने की,
उसे इस तरह प्यारा हुआ मैं
कि आजकल
मुझसे नहीं करती बात तक;
शायद डरती है
कि कहीं कोई ठेस न लग जाए मुझे...
वह नहीं करती है बात
और यही बात मुझे चुभती है सबसे ज्यादा..
वे करती हैं बातें
जिन्हें मैं बहुत प्यारा हूँ,
लेकिन उनकी बातें मुझे न प्यार देती हैं और न हीं कोई ठेस..
अब सोचता हूँ
कि "प्यारा मानने" और "उस तरह प्यार करने" के बीच
क्यों है यह पुल
जो बदल देता है परिभाषा प्यार और ठेस की?
मैं पेंडुलम की तरह टहलते हुए इस पुल पर
कोसता हूँ उन्हें
जो या तो इस तरफ हैं या उस तरफ
और जो ज़मीन बाँट कर बैठी हुई हैं सौतनों की तरह...
मै ,
जिसे "प्यारा" कहने वाली "उस तरह" का प्यार नहीं करती,
फेरता हूँ निगाहें दोनों तरफों से
और कूद पड़ता हूँ
पुल के नीचे बहती
.
.
नफरत की नदी में...
इस नदी में
यकीन मानिए...... बेहद सुकून है....
- Vishwa Deepak Lyricist
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Monday, November 05, 2012
फिर भी तुम्हारा हूँ
अब भी वहीं से पुकारती हो!!
दस कदम पीछे हटकर
उतर जाओ रास्ते से
या दस कदम बढकर
मुड़ जाओ मेरी तरफ...
यह कशमकश तोड़ो!!
जान लो -
मैं गुजर गया हूँ,
फिर भी तुम्हारा हूँ....
.
.
.
बँधा हूँ तुम्हारे अहद से,
इसलिए........ खुद लौट नहीं सकता!!!!
- Vishwa Deepak Lyricist
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Sunday, November 04, 2012
दोनों खीसे खाली हैं
पिछले लम्हे की तरह बीत हीं जाओ तुम...
मालूम है कि धूप थी,
पर वह माज़ी की बात है..
मालूम है कि तुम अब भी पड़ी हो मेरे सीने में,
मगर चौंकती नहीं हर साँस के साथ,
बस चुभती हो ज़रा-सा..
मालूम है कि तुम्हें खो दिया है मैंने..
नहीं....
मुझे मालूम है तुम रख न पाई मुझे संजोकर
और अब
दोनों खीसे खाली हैं...
मालूम है कि जो हुआ..बुरा हुआ,
मगर एक पहचान काफी है हज़ार अच्छी सुबहों के लिए..
इसलिए
यह न कहूँगा कि अजनबी बन जाओ तुम..
बस
पिछले लम्हे की तरह बीत जाओ तुम
ताकि
सुकून मिले तुम्हें भी.....
- Vishwa Deepak Lyricist
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Wednesday, October 31, 2012
पत्थर पे इक पत्थर पड़ा
थोड़ा बुझा, थोड़ा उड़ा,
आँखों में जो सपना गिरा,
पत्थर पे इक पत्थर पड़ा,
झरने चले, लावा उड़ा..
अच्छा हुआ, जैसा हुआ,
कसमें खुलीं, किस्सा खुला,
रस्में खुलीं, रस्ता खुला,
सहरा तले दरिया खुला..
- Vishwa Deepak Lyricist
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