Showing posts with label khwaab. Show all posts
Showing posts with label khwaab. Show all posts

Monday, December 17, 2018

बेटियाँ


बेटियाँ माँ होती हैं|

रूठती हैं, मनाती हैं ,
सराहती हैं, सुनाती हैं,
खीझती हैं, खींचती हैं,
रेशा-रेशा सींचती हैं|

बेटियाँ होती हैं जड़
पिता के तलवों की,
बीज़
हथेली की लकीरों की,
आवाज़
मूक जिजीविषा की,
ख्वाब
हर बुनी-अनबुनी नींद की|

बेटियाँ
जब हक़ जताती हैं
तो
भरी होती हैं आत्मविश्वास से,
हर क्रिया, प्रतिक्रिया पर
होता है एकाधिकार उनका|
पिता फिर
अपने अंश का अंश बन
सौंप देता है अपनी हर महानता,
हर विशालता
बेटी के बचपने की गोद में|
.
और
फूल जाता है आसमान तक...

- Vishwa Deepak Lyricist

Thursday, December 21, 2017

तुम हँसना


जब घाम गिरे
या बचकानी दुनिया के फिकरे
दो कौड़ी के दाम गिरें,
तुम हँसना!

एक माया है,
दिन-रात नज़र का साया है,
उनकी कथनी से क्या हासिल,
खुद में रखना खुद को शामिल,
बढते जाना,
गढते जाना,
हर नींद ख़्वाब चढते जाना,
फिर चाहे अनथक पैरों पर
धरती के जो इल्ज़ाम गिरें,
तुम हँसना!

हमने तुममें साँसें फूँकी?
ना!
तुमने हममें साँसें फूँकी,
तुमने हममें आसें फूँकी,
खुशियों में जीवन आ उतरा,
घर में एक आँगन आ उतरा,
हम ऋणी तुम्हारे हैं बेटी,
तुम खुद हमसे उऋण रहना,
और चाहे जितनी भी शर्त्तें
तुमपर अपनों के नाम गिरें,
तुम हँसना!

- Vishwa Deepak Lyricist

Sunday, May 18, 2014

साल भर पुरानी वह बात


साल भर पुरानी वह बात,
जिसकी उम्र महज एक साल है-
बड़ी हीं ताजी है।

मेरी ’बुक-सेल्फ’ की सबसे बोरिंग किताब में भी
भर गई थीं रंगीनियां...

आबाद हो चले थे
दिन-रात के कई ’अनाथ’ हिस्से..

नींद हो चली थी साझी
और ख्वाब पूरे..

अब बेफिक्री फिक्र देती थी
और फिक्र का बड़ा-सा बंडल
उतर गया था किन्हीं ’और’ दो आँखों में..
मेरे नाम के मायने भी बदल गए थे शायद..

तभी तो
भले पुकारा जाऊँ सौ बार;
चिढता न था...

सच में-
साल भर पुरानी वह बात,
जिसकी उम्र महज एक साल है-
बड़ी हीं ताजी है।

और हर पल जवां रखा है इसे
तुमने...
बस तुमने!!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Monday, February 24, 2014

तुम्हारा आना


सफेद झूठ होगा मेरा यह कहना कि
तुम्हारे आने से पहले
दिन खाली-खाली थे और रातें सूनी;
यह कहना कि
तुम्हें जानकर हीं मैंने जाना हैं ज़िंदगी को,
कि तुम आई
तभी धड़कनें उपजीं, साँसें कौंधीं, रगों में रक्त बह निकला...

मेरे शब्द गिर पड़ेंगे
कौड़ियों की तरह,
अगर मैं बोल दूँ कि
तुमने हीं हाड़-माँस में फूँके हैं प्राण...

यादों पर पड़े पदचिन्ह गवाही देंगे
कि मैं तुम्हें रख रहा हूँ धोखे में..

तुम कभी न कभी गुजरे नक्षत्रों को उतारोगी हथेली पर
और किस्मत की लकीरों पर दौड़ पड़ोगी उलटे पाँव..

टकराओगी सच से
और पिघल जाएगा मेरे सच का मोल..

इसलिए खुद कहता हूँ-
तुम्हारे आने से पहले भी
ज़िंदा था मैं,
जान चुका था ज़िंदगी के उतार-चढाव..

ज़िंदा था मैं,
लेकिन सुलगती साँसों की आंच पर चढे काठ की हांडी के मानिंद..
मेरे दिन लबरेज थे चंद तारों से
और रातों में जलन थी दावानल की;
दर-ओ-दीवार नाखूनों की छीलन से नुचे-खुचे थे
और सीने में बसते थे......... बस ज्वार-भाटे

तुमने प्राण नहीं फूँके,
बल्कि पेट के बल सरकते मेरे अस्तित्व में
जड़ दी है रीढ...
प्रेम की रीढ..

शून्य से ऊपर खींच ले जाना अगर प्रेम है
तो अनंत तक धंस चुके मेरे ख्वाबों को तुम्हारा अवलंब
क्या कहा जाएगा-
युग निर्धारित करे!!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Wednesday, February 13, 2013

हद दर्जे का चापलूस


मैं अपने शुद्ध स्वरूप में हद दर्जे का चापलूस हूँ...

तैरती मछलियों से पूछ लेता हूँ
उनके जीने-मरने के भाव..

हर साल दो इंच चढते पहाड़ों को
बताता हूँ
आसमान फोड़ने की ओर अग्रसर
और
आसमान को कह आता हूँ कान में
कि ज़मीन के उथले बादल
खाक पहुँचेंगे तुम तक...

मेरे ख्वाब मानते हैं खुद को
नींद का तारणहार

और नींद?
नींद तो अनाथालय है -
दूधमुँहे बच्चों को देती है
छत और बिछावन...

मेरे सारे शब्द
या तो गूंगे हैं या अर्थहीन,
लेकिन यह बात इन्हें मालूम नहीं;
मैं इन्हें पिरोता हूँ कविताओं में
और सीने पर तमगे लिए
लौट आते हैं ये अपने-अपने बाड़ों में
कीचड़ सने सूअर के बच्चों की तरह...

मैं बताता हूँ इन्हें शेर
और जमाता रहता हूँ हर शाम एक सर्कस...

जानता हूँ मैं
कि मेरे अंदर का कवि
अपने शुद्ध स्वरूप में
चापलूस है हद दर्जे का...

यकीन मानिए-
आप भी समझदार पाठक हैं!!!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Tuesday, January 22, 2013

ज़ेरोक्स करके रख लूँ मैं


आपकी बदमाशियाँ ज़ेरोक्स करके रख लूँ मैं..

आईये
कुछ बोलिये,
आँखों को मेरी खोलिये,
मुझको खिलौना कीजिए,
हाथों से टोना कीजिए..

पलकों पे साँसें मारिये,
कानों में झांसे मारिये,
मैं टोकूँ तो हँस दीजिए,
जो बोलूँ कि बस कीजिए
तो रूठ के चल दीजिए..

फिर लौट के खुद आईये
और आते हीं भिड़ जाईये...

आईये
आ जाईये,
आपकी बदमाशियाँ ज़ेरोक्स कर के रख लूँ मैं..

ख्वाब में आती है जो
आपकी हमनाम एक
आप-सी दिखती तो है
पर हैं हुनर उन्नीस हीं..

बीस तो बस आप हैं..

ख्वाब के उस ’आप’ को
आप करने के लिए
आईये
आ जाईये,
आपकी बदमाशियाँ ज़ेरोक्स कर के रख लूँ मैं..

देखिए,
साँस की खुराक का सवाल है!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Saturday, October 20, 2012

प्यार की मीठी चाय


तब रोया था वो...

पाँव लफ़्ज़ के उलझ पड़े थे,
छिटक के साँसें - सांय - गिरी थीं,
आँखों के फिर आस्तीन पर
प्यार की मीठी चाय गिरी थी,
बर्फ ख्वाब के पिघल गए तब,
पलक से बूँदें हाय, गिरी थीं..

हाँ, रोया था वो...

- Vishwa Deepak Lyricist

Friday, October 12, 2012

हारता रहा अपनी नींदें


रात भर तुम्हें सोचता रहा..
रात भर तुम्हारी बादामी आँखें बढाती रहीं मेरी याददाश्त..
रात भर बुनता रहा तुम्हारी पलकों से एक कंबल, एक बिस्तर..
रात भर लेता रहा करवटें तुम्हारे चेहरे के चारों ओर..

रात भर उधेड़ता रहा दो साँसों के बीच के धागे को..

रात भर बस जीता रहा तुम्हें... और हारता रहा अपनी नींदें...

रात भर कातता रहा मैं एक रात,
तुम्हारे ख्वाब में!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Thursday, September 06, 2012

जब लिखता था


मैंने लिखना छोड़ दिया है!

साँस चला के रात-रात भर,
आँख जला के रात-रात भर,
बात बढा के बात-बात पर
मैंने टिकना छोड़ दिया है!

वक़्त से किरचे नोच-नोच कर,
ख्वाब के परचे नोच-नोच कर,
हवा में पुलिये सोच-सोच कर,
मैंने बिकना छोड़ दिया है!
मैंने लिखना छोड़ दिया है।

आँख में तेरी डूब-डूब कर,
साँस में तेरी डूब-डूब कर,
प्यास से तेरी खूब-खूब पर
मैंने सपना जोड़ लिया है,
तुझसे लिखना... जोड़ लिया है...

- Vishwa Deepak Lyricist

Friday, August 24, 2012

आ दर्द बन


मुझे छीन ले मेरी ज़ात से,
मुझे छोड़ दे तेरी रूह में...

मुझे तोड़ ले मेरी ज़ीस्त से,
मुझे बाँध ले तेरी साँस से...

मुझे दर्द दे हमदर्द बन,
हमदर्द बन... आ दर्द बन...

मुझे रात दे, मुझे नींद दे,
मुझे ख्वाब दे, मुझे "आप" दे...

मुझे सौंप दे तेरे "आप" को....
मुझे सौंप दे.. मुझे छीन ले....

- Vishwa Deepak Lyricist

Sunday, August 19, 2012

चूहे खाएगी


आँख उतर रही है सीढियों से,
नींद चढ जाएगी ऊपर..दबे पाँव..बिल्लियों की तरह...

घंटियाँ ख्वाब की बँधी हों तो ज़रा चौंकूं भी...

घंटियाँ ख्वाब की गूंगी हैं, बहरी आँखें हैं,
नींद मखमल है तलवों तक रेशों से..

कौन रोकेगा? चढेगी माथे में.... चूहे खाएगी..

चूहे खाएगी,
सोंच खाएगी,
नोंच खाएगी,
रोज़ खाएगी,
आँख उतरते-उतरते... उतर जाएगी...

- Vishwa Deepak Lyricist

Friday, August 10, 2012

सौ चेहरे


मैंने सौ चेहरे रखे,
एक-दो गहरे रखे..

बोलती बाज़ी रही,
बेज़ुबां मोहरे रखे..

लफ़्ज़ बेमानी रहे,
मायने दुहरे रखे..

डूबती आँखें रहीं,
ख्वाब पर ठहरे रखे..

भागती "तन्हा"ई थी,
दर्द पर पहरे रखे..

- Vishwa Deepak Lyricist

Tuesday, July 31, 2012

आदिपुरूष


तुम क्यों देखते हो ख्वाब..
क्या ख्वाब में उतरता है कोई आदिपुरूष
और धर जाता है तुम्हारी नींद की सीपियों में
सच्चाई, सफलता और संभावनाओं के मोती..
क्या ख्वाब में
तुम्हारे गाँव के बरगद पर लौट आती हैं,
पिछली पतझड़ में भागी हुई गिलहरियाँ..
क्या ख्वाब में अंबर का इद्रधनुष
थमा देता है अपनी प्रत्यंचा तुम्हें
ताकि
बेध कर आसमान
उतार लो तुम
गंगा एक बार फिर..
क्या ख्वाब में
आँगन की तुलसी
सूखते-सूखते
पकड़ लेती है जड़ तुम्हारी मिट्टी की
और खींचकर सबकी आँखों से संवेदनाएँ
फुदकने लगती है फिर से..

शायद हाँ

तुमने यह सब देखा है
बंद आँखों से
और जब खोली हैं आँखें
तो खो चुका होता है वसंत,
कुचली जा रही होती हैं तुलसियाँ
और
अंबर का बाण खींचा होता है
तुम्हारी तरफ हीं..

तुमने जब खोली हैं आँखें
तो जा चुका होता है आदिपुरूष..

तुम्हें उसी आदिपुरूष की तलाश है,
बस इसलिए
तुम देखते हो ख्वाब!!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Tuesday, July 24, 2012

रात भर


इन अधूरी रातों के ख्वाब
चमगादड़-से
मेरी आँखों में लटके रहते हैं...

मैं ज़मीं पर पटकता हूँ अंगूठा
तो
आसमान फोड़ने लगते हैं
ये सारे चमगादड़..

एक बिजली उतरती है
आँखों के बरगद पे
और चीरकर पत्तों का सीना
समा जाती है
नींदों की कब्र में..

देखते हीं देखते
चैन-ओ-सुकून के
सारे सरमायेदार मेरे
कब्र में हीं हो जाते हैं
फिर से
लकवाग्रस्त...

मैं बटोरता हूँ उनकी हड्डियाँ
और बाँधकर उनसे चमगादड़ों को
खड़े कर देता हूँ
कई सारे "कागभगोड़े"...

फिर
लहलहा उठती है
खुदकुशी यकायक..

और
बदमिजाज़
डरपोक ज़िंदगी
पास भटकती भी नहीं
रात भर....

- Vishwa Deepak Lyricist

Wednesday, July 04, 2012

चलो


चलो चाँद की चाहरदीवारी तोड़ आएँ,
चलो लूट लें एकबारगी हक़ शायरों का...

चलो जाग लें जुगनू की रोशनी तले,
चलो छीन लें खामोशियाँ सब रात से...

चलो जान लें है जानलेवा ज़िंदगी,
चलो जान दे के मौत से रेहन छुड़ा लें...

चलो बात कर के शब्द को बेमानी कर दें,
चलो शांत रह के छोड़ दें सागर नदी में...

चलो नींद पी के ख्वाब को जबरन उठा लें,
चलो ख्वाब ला के नींद को जी भर धुनें...

चलो आस रख के फिर से लुट जाएँ यहाँ,
चलो प्यार कर के आखिरी जेवर गवां दें...

चलो...

चलो चाँद की चाहरदीवारी तोड़ आएँ...
चलो प्यार कर के आखिरी जेवर गवां दें...

- Vishwa Deepak Lyricist

Wednesday, June 27, 2012

मुझे इस बात पे रोना पड़ा है


मुझे इस बात पे रोना पड़ा है
कि यूँ जज़्बात को ढोना पड़ा है..

जिसे बुनियाद का पत्थर कहा था,
पकड़ के आज वो कोना, पड़ा है..

जो हर एक ख़्वाब में शामिल रहा था,
उसे हर याद में खोना पड़ा है..

दिल-ए-महबूब से कू-ए-हवस तक,
मुझे बदनाम हीं होना पड़ा है..

(ख़ुदा के दैर से काफ़िर-गली तक,
मुझे बदनाम हीं होना पड़ा है..)

जवां उस चाँद के थे सब, मगर अब
उसे भी रात में सोना पड़ा है..
(यहीं फुटपाथ पे सोना पड़ा है..)

- Vishwa Deepak Lyricist

Sunday, June 24, 2012

तराजू


रात की तराजू ले
घोड़े बेचकर
नींदें खरीदने का रिवाज़
गुजर गया है शायद..

आजकल
नहीं समाते
एक हीं पलड़े पर
नींद और ख्वाब..

कमबख्त
छटांक भर का ख्वाब
मन भर के नींद पर
कितना भारी है!

सोचता हूँ
ख्वाब बेचकर नींदें खरीद लूँ
या बेच दूँ नींदों को
ख्वाबों की खातिर?

बेशक़
मुहावरे के सारे घोड़े
बेमोल, कम-वज़न हो गए हैं,
जब से सपनों ने सीख लिया है उड़ना

- Vishwa Deepak Lyricist