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Friday, October 12, 2012

हारता रहा अपनी नींदें


रात भर तुम्हें सोचता रहा..
रात भर तुम्हारी बादामी आँखें बढाती रहीं मेरी याददाश्त..
रात भर बुनता रहा तुम्हारी पलकों से एक कंबल, एक बिस्तर..
रात भर लेता रहा करवटें तुम्हारे चेहरे के चारों ओर..

रात भर उधेड़ता रहा दो साँसों के बीच के धागे को..

रात भर बस जीता रहा तुम्हें... और हारता रहा अपनी नींदें...

रात भर कातता रहा मैं एक रात,
तुम्हारे ख्वाब में!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Sunday, August 05, 2012

सिल्क वर्म्स की लाशें


मैं उस वक़्त
बरगद के उसी तने में
धँसा जा रहा था
जिसकी चौहद्दी में
बाँधती आई हो तुम
उम्मीदों के अनगिनत धागे...
उन धागों से
छिल-छिलकर
बरगद की छालें
समाती जा रही थीं
मेरे सीने में
और काटती जा रही थीं
साँसों के बेहया फंदों को,
फिर भी साँसें मुँह तक आकर
लौट जाती थीं सीने में
और रेंगने लगती थीं
आहिस्ता-आहिस्ता..
मैं या तो पत्तों के रास्ते
हो जाना चाहता था धुँआ
या पानी-पानी होकर
बह जाना चाहता था
जड़ की बेबस गलियों में
लेकिन मुझे न तो
ज़मीन नसीब थी
न हीं आसमान..

वे
जिस वक़्त नोंच रहे थे
तुम्हारे कपड़े
और उनके इरादे
पहुँच चुके थे
रात की अंदरूनी ग्रंथियों तक,
उस वक़्त मैं
नीरो-सा
शहतूत की उसी डाल पर
बैठकर बजा रहा था बांसुरी
जिसपे अगली सुबह
तब्दील होने थे
कुछ लार्वे प्युपाओं में...

उन नामुरादों ने
न सिर्फ
धज्जियाँ की
तुमसे लिपटे
सूत के कुछ रेशों की
बल्कि उनने तो
शहतूत की शाख हीं काट डाली
और
अगले हीं पल
मेरे हीं पैरों से दबकर
मर गए वे लार्वे,
मर गए वे सिल्क-वर्म्स
बालिग होने से पहले हीं...

कुछ लम्हात बाद
तुमने जब
ओढी थी चुप्पी की चादर
और लौट रही थी
घर
अपनी चीखों की
लावारिस लाशों के साथ
तो वहीं तुम्हारी परछाई से
दो गज ज़मीन नीचे
मैं उन रेशम के कीड़ों को दफना रहा था...

रेशम के कीड़े
जो हर पल बता रहे थे मुझे
कि मेरी औकात
ज़मीन के कीड़ों से बढकर
कुछ भी नहीं..
रेशम के कीड़े
जो हर साल
तुम्हारी ऊँगलियाँ छूकर
आ जाते थे
मेरी कलाई की कमर कसने...

रेशम के कीड़े
जिन्हें इस बार
राखी बनना गंवारा न था...

- Vishwa Deepak Lyricist