जब घाम गिरे
या बचकानी दुनिया के फिकरे
दो कौड़ी के दाम गिरें,
तुम हँसना!
एक माया है,
दिन-रात नज़र का साया है,
उनकी कथनी से क्या हासिल,
खुद में रखना खुद को शामिल,
बढते जाना,
गढते जाना,
हर नींद ख़्वाब चढते जाना,
फिर चाहे अनथक पैरों पर
धरती के जो इल्ज़ाम गिरें,
तुम हँसना!
हमने तुममें साँसें फूँकी?
ना!
तुमने हममें साँसें फूँकी,
तुमने हममें आसें फूँकी,
खुशियों में जीवन आ उतरा,
घर में एक आँगन आ उतरा,
हम ऋणी तुम्हारे हैं बेटी,
तुम खुद हमसे उऋण रहना,
और चाहे जितनी भी शर्त्तें
तुमपर अपनों के नाम गिरें,
तुम हँसना!
- Vishwa Deepak Lyricist
रात भर तुम्हें सोचता रहा..
रात भर तुम्हारी बादामी आँखें बढाती रहीं मेरी याददाश्त..
रात भर बुनता रहा तुम्हारी पलकों से एक कंबल, एक बिस्तर..
रात भर लेता रहा करवटें तुम्हारे चेहरे के चारों ओर..
रात भर उधेड़ता रहा दो साँसों के बीच के धागे को..
रात भर बस जीता रहा तुम्हें... और हारता रहा अपनी नींदें...
रात भर कातता रहा मैं एक रात,
तुम्हारे ख्वाब में!!
- Vishwa Deepak Lyricist
मैं तुम्हारी एक बूँद हँसी के लिए,
डाल सकता हूँ कोल्हू में अपनी दो "मन" साँसें...
जानता हूँ कि
तेल निकलेगा और चढेगा किसी देवता पर..
देवता,
जो कतई मैं नहीं!!!!!!
- Vishwa Deepak Lyricist
वह बेरहम मालिक-मकान
कल निकाल देगा मुझे
इस कमरे से...
आज भर का छप्पर है,
आज भर का बिस्तर है..
आज भर हीं नखरे हैं...
कल से मर-मर जीना होगा,
कल से साँसें लेनी होंगी..
कल कहीं बसेरा करना होगा,
किसी कोख में जाना होगा..
वो कोख भी तो उकता जाएगी.....
- Vishwa Deepak Lyricist