मैं एक दिन लिखूँगा खुद को
तुम उस दिन भी नकार देना
मेरे लिखे को
आदतन..
और मैं
निकल जाऊँगा
तुम्हारी अपेक्षाओं से परे
बिल्कुल अपनी कविताओं की तरह
हँसते हुए........ तुमपे!!!
- Vishwa Deepak Lyricist
तेरी आँखें कारखाना हैं क्या,
अहसास कारीगर हैं जिनमें..
फिर रोज़-रोज़ का रोना क्यों?
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कभी शिकवों पे हँसते थे,
अभी हँस दें तो शिकवे हों..
गिरा है औंधे मुँह रिश्ता..
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कल पर निकल आएँगे कानों के भी,
आज सुन लो मुझे गर सुनना हो..
मैं बोल के उड़ जाऊँगा यूँ भी...
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उसे ग़म है कि उसकी खुशियों का कद छोटा है,
मुझे खुशी है कि ग़म की पकड़ कमज़ोर हुई..
मैं ज़िंदा हूँ और वो मरता है खुशी रखकर भी..
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कुछ झांकता है अंदर, कुछ भागता है बाहर,
मैं खुद से अजनबी-सा यह खेल देखता हूँ..
सीने में जंग छिड़ी है ईमां और बुज़्दिली में...
- Vishwa Deepak Lyricist
उसने अपनी सारी आदतें उतार दीं हैं मेरे कारण...
अब वह बिगड़ने से पहले देख लेता है मेरा "मूड"..
हँसता ज्यादा है आजकल,
ज्यादातर खुद पर...
अकेले में बाँटना चाहता है ग़म मुझ से
और रख देता है दिल खोलकर..
वह अब मेरी "कड़वी" बातें भी सुन लेता है
और झुका लेता है सर...
वह झुका लेता है सर
और चिढ जाता हूँ मैं..
चिढता था मैं पहले भी,
जब वह ऐसा कतई न था..
वह बदल गया है
लेकिन मैं नहीं बदला...
वह जो मेरा "पिता" है,
मुझे आज भी लाजवाब कर जाता है!!!
- Vishwa Deepak Lyricist
मैं तुम्हारी एक बूँद हँसी के लिए,
डाल सकता हूँ कोल्हू में अपनी दो "मन" साँसें...
जानता हूँ कि
तेल निकलेगा और चढेगा किसी देवता पर..
देवता,
जो कतई मैं नहीं!!!!!!
- Vishwa Deepak Lyricist
आज आए तुम,
मेरे कान खींचे,
कुछ फुसफुसाए
और निकल लिए...
मैं अभी तक सोंच में हूँ
कि तुमने समझाया मुझे
या बहका दिया... पिछली बार-सा..
कहीं फिर से मैं
एक-आध हँसी के बाद
सीख न लूँ खुश रहना...
इस ईद भी!!!
- Vishwa Deepak Lyricist