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Monday, January 07, 2013

गिरा है औंधे मुँह रिश्ता



तेरी आँखें कारखाना हैं क्या,
अहसास कारीगर हैं जिनमें..

फिर रोज़-रोज़ का रोना क्यों?

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कभी शिकवों पे हँसते थे,
अभी हँस दें तो शिकवे हों..

गिरा है औंधे मुँह रिश्ता..

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कल पर निकल आएँगे कानों के भी,
आज सुन लो मुझे गर सुनना हो..

मैं बोल के उड़ जाऊँगा यूँ भी...

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उसे ग़म है कि उसकी खुशियों का कद छोटा है,
मुझे खुशी है कि ग़म की पकड़ कमज़ोर हुई..

मैं ज़िंदा हूँ और वो मरता है खुशी रखकर भी..

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कुछ झांकता है अंदर, कुछ भागता है बाहर,
मैं खुद से अजनबी-सा यह खेल देखता हूँ..

सीने में जंग छिड़ी है ईमां और बुज़्दिली में...

- Vishwa Deepak Lyricist

Tuesday, July 17, 2012

क्या कहते हो कॉपरनिकस


खेल-खिलवाड़ के इस दौर में
कंचे की शक्ल में
नज़र आती है मुझे
यह दुनिया..

यह दुनिया
जो आजकल
थैली में है हमारी..

या तो हमने
अंटी मारी है
या
मगरूरियत में
मारा गया है वो
जिसने बनाया था यह खेल...

उसने हारकर
लगा ली है फाँसी,
समा गया है
कई सारे कोपभवनों में..

और हम?

जीतकर हार रहे हैं
क्योंकि
हमें कंचे से ज्यादा
फिक्र है
उन कोपभवनों की

हम शिकार हो रहे हैं
अपने डर
और उसके बड़प्पन का,
हम शिकार हो रहे हैं
उसके डर
और अपने बड़प्पन का..

सनद रहे!
उसके शमशान
सजाए हैं हमने,
पर हमारे शमशान?
हमारे हारने पर
कोई उतारने भी नहीं आएगा
हमें
क्रॉश से..

इसलिए
इससे पहले कि
कंचे-सी यह दुनिया
जेबों और हथेलियों में घिसकर
किरकिरी हो जाए,
आओ खींचे इसे हम
दो मंझली ऊँगलियों से
और उछाल दें आसमान में..

जो थम गई है
उसकी सीढियों पर,
जो थम गई है
हमारी थैलियों में,
उसे उतार दें एक धक्के से
सूरज के इर्द-गिर्द..

क्या कहते हो
कॉपरनिकस?
गैलीलियो?
हमारी मेहनत सफल तो होगी ना?

खैल-खिलवाड़ के इस दौर में...

- Vishwa Deepak Lyricist