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Monday, January 07, 2013

गिरा है औंधे मुँह रिश्ता



तेरी आँखें कारखाना हैं क्या,
अहसास कारीगर हैं जिनमें..

फिर रोज़-रोज़ का रोना क्यों?

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कभी शिकवों पे हँसते थे,
अभी हँस दें तो शिकवे हों..

गिरा है औंधे मुँह रिश्ता..

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कल पर निकल आएँगे कानों के भी,
आज सुन लो मुझे गर सुनना हो..

मैं बोल के उड़ जाऊँगा यूँ भी...

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उसे ग़म है कि उसकी खुशियों का कद छोटा है,
मुझे खुशी है कि ग़म की पकड़ कमज़ोर हुई..

मैं ज़िंदा हूँ और वो मरता है खुशी रखकर भी..

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कुछ झांकता है अंदर, कुछ भागता है बाहर,
मैं खुद से अजनबी-सा यह खेल देखता हूँ..

सीने में जंग छिड़ी है ईमां और बुज़्दिली में...

- Vishwa Deepak Lyricist

Monday, August 20, 2012

ईद मुबारक


आज आए तुम,
मेरे कान खींचे,
कुछ फुसफुसाए
और निकल लिए...

मैं अभी तक सोंच में हूँ
कि तुमने समझाया मुझे
या बहका दिया... पिछली बार-सा..

कहीं फिर से मैं
एक-आध हँसी के बाद
सीख न लूँ खुश रहना...

इस ईद भी!!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Monday, July 30, 2012

मैनहोल


अब भी तुम उसी "मैनहोल" पे खड़े हो,
जहाँ डूबती आई हैं
तुम्हारी लाखों पीढियाँ...

करोड़ों बजबजाते कीड़ें
उनके कानों में
करते रहे हैं गजर-मजर
लेकिन तुम्हारी पीढियाँ
बेसुध-सी
निहारती रही हैं
आसमान के रंगीन अमलतासों को
कि कब एक पत्ता टूटे
और उनकी आँखें
उस पत्ते पर बैठकर
कर आएँ दुनिया की सैर...

तुम भी तो
गुलमोहर पर बैठी
उस हारिल में
ढूँढ रहे हो
सोने के कारखाने..

तुम!
जिसने न चलना सीखा है,
न उड़ना
और जो खड़ा है एक "मैनहोल" पे...

- Vishwa Deepak Lyricist

Sunday, July 08, 2012

रात के इयर-ड्रम्स


त्राहिमाम...

सन्नाटे रात के
चीखते हैं
जब कूद्ती हैं उनपे
सौ कानों में ठेली गईं
तुम सब की
चापलूसी आवाज़ें..

भाई,
भेड़ियाधसान
भीड़ है यहाँ
विचारधाराओं की
और तुम
हर क्रॉश, हर त्रिशूल, हर चाँद पर
अपनी अमूल्य सोच का
लेबल चिपकाते फिरते हो..

हज़ार... हज़ार एक...हज़ार दो...हज़ार तीन,
चलो
तुम भी कर लो गंगा-स्नान
और बजा के अपनी दुंदुभि
फोड़ दो
रात के इयर-ड्रम्स...

दिन तो
मर हीं चुका है
पीलिये से,
अब रात के कानों से भी
खींचकर खून
कर दो उसे मरीज़
एनीमिया का...

मैं नहीं कहता,
लेकिन
ऐसे में
इंसानियत की दिनचर्या
किसी से लोहा न ले पाए... तो मत कहना!!

- Vishwa Deepak Lyricist