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Friday, January 18, 2013

ज़िंदगी आपकी ज़मीन पर है चल पड़ी


ज़िंदगी जुए से है निकल पड़ी,
ज़िंदगी धुएँ से है निकल पड़ी..

ज़िंदगी अब होश में है,
आपकी ज़मीन पर चल रही है,
जोश में है..

फूल के लिबास में,
ओस के कयास में,
खुशबूओं से खेलती
जूही, अमलतास में,
ज़िंदगी
धूप की छुअन से है मचल पड़ी...

ज़िंदगी लिजलिजी धुंध से निकल पड़ी..

ज़िंदगी अशर्फ़ी हुई कारण आपके,
रूह में मिलाकर देह को खिला दूँ,
अनमोल बर्फ़ी हुई कारण आपके...

आपके..

ज़िंदगी आपकी आँख में है ढल पड़ी..

हारे हुए जुए से जीतकर निकल पड़ी,
काले हुए धुएँ से बीतकर निकल पड़ी,
ज़िंदगी आपकी ज़मीन पर जो चल पड़ी...

ज़िंदगी..

- Vishwa Deepak Lyricist

Monday, July 30, 2012

मैनहोल


अब भी तुम उसी "मैनहोल" पे खड़े हो,
जहाँ डूबती आई हैं
तुम्हारी लाखों पीढियाँ...

करोड़ों बजबजाते कीड़ें
उनके कानों में
करते रहे हैं गजर-मजर
लेकिन तुम्हारी पीढियाँ
बेसुध-सी
निहारती रही हैं
आसमान के रंगीन अमलतासों को
कि कब एक पत्ता टूटे
और उनकी आँखें
उस पत्ते पर बैठकर
कर आएँ दुनिया की सैर...

तुम भी तो
गुलमोहर पर बैठी
उस हारिल में
ढूँढ रहे हो
सोने के कारखाने..

तुम!
जिसने न चलना सीखा है,
न उड़ना
और जो खड़ा है एक "मैनहोल" पे...

- Vishwa Deepak Lyricist

Tuesday, June 19, 2012

सनद रहे


सनद रहे!!! 



आसमां की अंतड़ियों में 
अम्ल डाल के बैठे हैं जो 
उनकी नाजुक जिह्वाओं पे 
अमलतास के बीज पड़ेंगे - 
ऐसे ख्वाब संजोने वाले 
उन सारे कापुरूषों पे अब 
जीर्ण-शीर्ण हीं सही मगर कुछ 
खंडहर बनने को आतुर 
मेरे भूत के पुण्य दो-महले 
उसी अम्ल की बारिश चुनकर 
सर से नख तक ठप-ठप, ढप-ढप 
बनकर कई सौ गाज़ गिरेंगे.. 


हाँ 
हाँ 
आज के आज गिरेंगे... 


सनद रहे!!! 

 - Vishwa Deepak Lyricist