वही धूप,
वही परछाई..
देह नया है... लेकिन अब
वही उम्र,
ज़रा अलसाई..
नेह नया है... लेकिन अब
लफ़्ज़ वही हैं,
वही हैं मानी,
सोए पड़े थे
ये अभिमानी..
अब जाग गए हैं... सब के सब..
देह नया है... देखो अब
- Vishwa Deepak Lyricist
ज़रा-सी आँख लगी है,
सोने दो
इसे..
तुम अपनी हवाओं की बांसुरी
फूंको
पहाड़ों के कानों में,
रोशनी के छींटे उड़ेल आओ
फूलों पे
गुलमोहर के,
जाकर निहारो एक-टक
रात भर बतियाते
मस्जिद-मंदिर के गुंबदों को,
पाँव चूमो
नीम-नींद में डूबी
गिलहरियों के -
तुम्हारी रचनाएँ तो वे भी है,
जाओ
उन पर नाज़ करो
इस वक़्त..
माँग लो
गौरैये से उसके पंख
और पहली उड़ान की तरह
निकल जाओ क्षितिज नापने..
निश्चिंत रहो-
तुम्हारी यह कविता
कर रही है मेरी डायरी में आराम..
मुझे प्यार पढने दो..
तुम आना कल सुबह
सूरज के साथ
और गुनगुना लेना इसे
गुनगुनी धूप की गिलौरी निगलकर..
तब तक
सोने दो इसे,
ज़रा-सी आँख लगी है!!!
- Vishwa Deepak Lyricist
ज़िंदगी जुए से है निकल पड़ी,
ज़िंदगी धुएँ से है निकल पड़ी..
ज़िंदगी अब होश में है,
आपकी ज़मीन पर चल रही है,
जोश में है..
फूल के लिबास में,
ओस के कयास में,
खुशबूओं से खेलती
जूही, अमलतास में,
ज़िंदगी
धूप की छुअन से है मचल पड़ी...
ज़िंदगी लिजलिजी धुंध से निकल पड़ी..
ज़िंदगी अशर्फ़ी हुई कारण आपके,
रूह में मिलाकर देह को खिला दूँ,
अनमोल बर्फ़ी हुई कारण आपके...
आपके..
ज़िंदगी आपकी आँख में है ढल पड़ी..
हारे हुए जुए से जीतकर निकल पड़ी,
काले हुए धुएँ से बीतकर निकल पड़ी,
ज़िंदगी आपकी ज़मीन पर जो चल पड़ी...
ज़िंदगी..
- Vishwa Deepak Lyricist
चलो, कुम्हलाया जाए...
हिस्से की हम धूप खा चुके,
रात से "मन" भर ओस पा चुके,
भौरों के संग धुनी रमा चुके,
खाद-पानी के भोग लगा चुके,
आसमान से मेघ ला चुके,
हुआ बहुत, अब जाया जाए,
चलो, कुम्हलाया जाए....
अब औरों को हक़ लेने दो,
गगन का सूरज तक लेने दो,
हवा की चीनी चख लेने दो,
नसों में माटी रख लेने दो,
उन्हें भी थोड़ा थक लेने दो,
सुनो, ज़रा सुस्ताया जाए,
चलो, कुम्हलाया जाए....
चलो!!!!!!
- Vishwa Deepak Lyricist