तेरी आँखें कारखाना हैं क्या,
अहसास कारीगर हैं जिनमें..
फिर रोज़-रोज़ का रोना क्यों?
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कभी शिकवों पे हँसते थे,
अभी हँस दें तो शिकवे हों..
गिरा है औंधे मुँह रिश्ता..
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कल पर निकल आएँगे कानों के भी,
आज सुन लो मुझे गर सुनना हो..
मैं बोल के उड़ जाऊँगा यूँ भी...
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उसे ग़म है कि उसकी खुशियों का कद छोटा है,
मुझे खुशी है कि ग़म की पकड़ कमज़ोर हुई..
मैं ज़िंदा हूँ और वो मरता है खुशी रखकर भी..
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कुछ झांकता है अंदर, कुछ भागता है बाहर,
मैं खुद से अजनबी-सा यह खेल देखता हूँ..
सीने में जंग छिड़ी है ईमां और बुज़्दिली में...
- Vishwa Deepak Lyricist
उस शायर के नाम,
जिसने
रदीफ़ और काफ़िया को इतनी दी तवज्जो
कि भूल गया
वज़न दुरूस्त करना...
इंसान तो बना डाला
लेकिन ईमान कसने में कर गया कंजूसी..
शायर,
आज तुम्हारी ग़ज़ल
जगह-जगह से चुभने लगी है,
ज़हरीले नाखून उग आए हैं उसमें..
ज़रा
एक बार तुम भी यह ग़ज़ल गुनगुना कर देखो,
लहुलूहान हो जाओगे..
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दुनिया का यह मुशायरा
चाहता है ग़ज़लों की नई खेंप -
तंदुरुस्त, वज़नदार..
अपना पुराना दीवान फेंक दो
और नया लिखो सिरे से..
तुम सुन रहे हो ना शायर?
सुनो तो...
- Vishwa Deepak Lyricist
तालीम के सरमायेदार!
बेरोज़गार फिर रहे
हैं लफ़्ज़ बेमानी हज़ार...
सूखे की मार!!
आँखों में दरिया काट के
जब से दिया सहरा उतार..
तालीम क्या, तहरीर क्या,
तहज़ीब... नाउम्मीदवार..
जा रे सुखनवर
अबकी बार,
बनके शुतुरमुर्ग रेत में
सर डालना जो ज़ार-ज़ार,
एक बूंद भर हीं थूक में
हो जाना गर्क बेइख्तियार...
ईमां के पार..
हैं कूच कर गए सभी
दानिश्वर क़ुव्वत उजाड़..
तालीम के सरमायेदार,
तारीक़ के सरमायेदार..
- Vishwa Deepak Lyricist