फटती है बिवाई
तो मैं
निकल पड़ता हूँ चप्प्ल सिलवाने...
फसलों को मार जाता है पाला
तो मैं
हथेली पर रोपने लगता हूँ
नई उम्र के नए बिरवे..
चलती सड़क
गुलाटी मार
जब झपट पड़ती है मुझपे
तो मैं हाथ-पाँव झाड़
निपोड़ देता हूँ अपनी बत्तीसी
और
पकड़कर पगडंडियों की पूँछ
करने लगता हूँ चीटियों से कदम-ताल...
चीखती रातें
मुझे लगती हैं
बेताल-दर्शन का
स्पेशल टूर पैकेज...
मैं मुंडवा लेता हूँ सर
जब उलझने लगती हैं
मेरे बालों में सवाना घास,
फिर बेच डालता हूँ
अपने घर के सारे ढोलक, तबले, मृदंग...
मैं निकालता हूँ रोज़ नई धुन
अपनी झुकी पसलियों से
और वे कहते हैं कि
मैं बजाया जा रहा हूँ..
क्या मैं बजाया जा रहा हूँ?
मुझे नहीं लगता
लेकिन
वे दु:खी हैं कि मुझे दु:ख का दु:ख नहीं...
वे डाँट रहे हैं मुझे
और अब मैं सीख रहा हूँ
उनसे नए शब्द
अपनी कविताओं के लिए...
कल फिर से लिखूँगा -
"मेरे शिक्षकों.... शुक्रिया!!!"...
- Vishwa Deepak Lyricist
चलो देश बदल लें..
गुस्से के सौ अम्ल ढल रहे
आँखों के कोयल-बादल में,
मौसम के घुन समा रहे हैं
हौसलों के गेहूँ-चावल में..
सड़ जाए खलिहान और मिट्टी
देह की ऊसर-सी हो जाए,
आओ इससे पहले हम-तुम
जीने के परिवेश बदल लें..
चोंगा नकली खुशियों का हम
अपने चेहरों से झट फेंकें,
अपने माथे के खंडहर से
आलस की हर चौखट फेंकें..
तोड़ पड़ें इस राग-धर्म के
रीत-रिवाज, हर मोह मिटा दें
और हटाकर सड़ी-सी केचुल
इस लम्हे हीं भेष बदल लें..
चलो... चलें...
यह देश बदल लें..
- Vishwa Deepak Lyricist
पोरों में बर्फ जम जाए
तो टूट जाता है पत्थर भी,
कट-कटा उठते हैं दाँत लोहे के
जब सर पर काबिज़ होता है कुहासा...
फिर वह तो एक सौ-साला इमारत थी..
हाय!
छत उठ गई पोते-पोतियों के सर से,
भगवान घर की आत्मा को शांति दे...
- Vishwa Deepak Lyricist
उस शायर के नाम,
जिसने
रदीफ़ और काफ़िया को इतनी दी तवज्जो
कि भूल गया
वज़न दुरूस्त करना...
इंसान तो बना डाला
लेकिन ईमान कसने में कर गया कंजूसी..
शायर,
आज तुम्हारी ग़ज़ल
जगह-जगह से चुभने लगी है,
ज़हरीले नाखून उग आए हैं उसमें..
ज़रा
एक बार तुम भी यह ग़ज़ल गुनगुना कर देखो,
लहुलूहान हो जाओगे..
.
.
.
दुनिया का यह मुशायरा
चाहता है ग़ज़लों की नई खेंप -
तंदुरुस्त, वज़नदार..
अपना पुराना दीवान फेंक दो
और नया लिखो सिरे से..
तुम सुन रहे हो ना शायर?
सुनो तो...
- Vishwa Deepak Lyricist
मुखौटा ओढकर हँसता रहता हूँ दिन भर..
रात को मुखौटा उतारता हूँ तो
छिली होती है झुर्रियाँ...
उम्र आँसू की आदी हो गई है शायद...
अब सुबह तक रोऊँगा तभी चेहरे का फर्श पक्का होगा,
जान आएगी सीमेंट में...
इतना तो अनुभव है;
मैं अनुभव से बोलता हूँ!!!!!
- Vishwa Deepak Lyricist
चाँद पत्थर है,
आसमां पानी,
रात लहरों का उठना-गिरना है...
रात उतरेगी,
आके मुझमें हीं.
मेरी आँखों में सारे साहिल हैं...
चाँद भारी है..
चोट तीखी है..
मेरी यादें हैं...... उसने फेंकी हैं...
- Vishwa Deepak Lyricist
खास बात ये है कि
मैं खास हो चला था जब,
हालात थे तेरे हाथ में
तुझे रास आ गया था तब..
आँखें तेरी थी बाज-सी
जो बाज़ आती थीं नहीं,
बस ढूँढती थी खामियाँ
सीने की मेरी खोह में,
रहती थी इसी टोह में
कि गर जो कुछ ज़िंदा दिखे,
तो फिर न आईंदा दिखे..
कुचले पड़े थे सब मेरे
जज़्बात तेरे दर पे जब,
हाँ, खास बात ये है कि
मैं खास हो चला था तब...
- Vishwa Deepak Lyricist
नींद के दरवाज़े खोलकर
आई वो धीरे से...
न चश्मा उतारा,
न कपड़े बदले,
न हँसी,
न रोई,
न हिचकी,
न ठिठकी..
बस मुड़ी मेरी ओर
और
खींच कर मुझे
समा गई बिस्तर में...
बदचलन मौत!!!
- Vishwa Deepak Lyricist
मैं नहीं जानता इस "मैं" को!
मैं एक "मैं" को जानता था पहले,
जानता था तब तक
जब तक तुम्हें नहीं सौंपी थी मैंने
उस "मैं" की जिम्मेदारी..
अब न तुम हो,
न वो "मैं" है
और जो आजकल
मुझमें "मैं" बनकर रहता है
वह या तो सौतेला है मेरा
या रहता है सातवें आसमान पर..
या फिर दोनों है...
क्या मालूम!
सुनो,
मेरे उस "मैं" से मन भर गया हो
तो भेज दो बैरंग
या
ले आओ साथ में..
मैं बेचैन हूँ -
अपना यह नया "मैं"
सौंपने के लिए तुम्हें,
तुम्हारे हीं लायक है
खूब जमेगा तुम पर...
- Vishwa Deepak Lyricist
अब कि
तुम्हारे फिसलनदार कोटरों में
वह माद्दा नहीं कि
मेरी परछाई तक तो थाम सकें...
ये तुम्हारी दो "गज़ाल-सी आँखें"
नदी भर-भर रोती रहें
या डूब मरें उन्हीं में,
मैं किनारे के पत्थर-सा
बैठा रहूँगा वहीं,
भले तुम भिंगोती रहो मुझे,
लेकिन मैं न राह दूँगा... न हीं हाथ...
हाँ, इतनी मेहरबानी करूँगा
कि
जब तुम सर या पैर दे मारो मुझपे,
तो मैं
सहेज के रख लूँ खून के कुछ कतरे
जो यकीनन हैं मेरे हीं...
याद है? -
मेरी उस दुनिया
की चूने वाली दो दीवारों पर
कत्थई रंग से तुमने लिखा था
मेरा नाम कभी
और मैं हर बार अपने नाम के रस्ते
तुम्हारे नाम, तुम्हारी पहचान में उतर आता था
और इस तरह मुकम्मल हो जाता था मैं,
मुझे लगता था
कि दो पहचानों ने एक पहचान को जना है...
तुमने न जाने कब
उन दीवारों में खिड़कियाँ ठूंस डालीं,
न जाने कितनी बार
खुल चुकीं है वे खिड़कियाँ अब तक..
आह!
कत्थई को कालिख कर दिया तुमने!!!
अब
तुम्हारी इन फिसलनदार कोटरों में
वही ठहर सकता है
जो नाखून टिका दे इनकी ज़मीं पे
या छील आए इन्हें
जैसे कोई हटाता है
काई अपने आंगन से..
मैं न कर पाऊँगा ऐसा
क्योंकि इन कोटरों में
कभी रहा था मैं
अपना हक़ जानकर...
- Vishwa Deepak Lyricist
१.
कदम ताल
ख्वाब से ख्वाब तक
रात सौ फांक
२.
आकाश गंगा
यादों की खूनी राह
घिसता मन
३.
दर-ब-दर
धूप के पीले पन्ने
सुबके दिन
४.
तुम ना आई
बीते छह जन्मों-सी
इस बार भी
५.
कुदरत है!
सूखे चढें आग पे
कच्चे देवों पे
६.
ढूँढना तुम
फुरसत के पल
फुरसत से
७.
बातें दिल की
जबकि सारे जानें
मैं हीं गाफ़िल
- विश्व दीपक