चलो देश बदल लें..
गुस्से के सौ अम्ल ढल रहे
आँखों के कोयल-बादल में,
मौसम के घुन समा रहे हैं
हौसलों के गेहूँ-चावल में..
सड़ जाए खलिहान और मिट्टी
देह की ऊसर-सी हो जाए,
आओ इससे पहले हम-तुम
जीने के परिवेश बदल लें..
चोंगा नकली खुशियों का हम
अपने चेहरों से झट फेंकें,
अपने माथे के खंडहर से
आलस की हर चौखट फेंकें..
तोड़ पड़ें इस राग-धर्म के
रीत-रिवाज, हर मोह मिटा दें
और हटाकर सड़ी-सी केचुल
इस लम्हे हीं भेष बदल लें..
चलो... चलें...
यह देश बदल लें..
- Vishwa Deepak Lyricist
कुम्हार की मिट्टी पे कुकुरमुत्ते-सा खड़ा हूँ मैं...
गदहे की टाँगों के इर्द-गिर्द पड़ा हूँ मैं...
कुम्हार ने उठाई खुरपी,
गदहे ने उठाई टांग,
और लो.. कोने में मरा हूँ मैं..
पर ये क्या...
मेरे अंदर का आदमी बोले
कि
गदहे की पीठ पर का घड़ा हूँ मैं..
तब तो कद में
गदहे से भी बड़ा हूँ मैं....
कुकुरमुत्ते-सा खड़ा हूँ मैं...
- Vishwa Deepak Lyricist
कमाल का है पैरहन दुनिया की ज़ात का,
उधड़े कि या साबूत हो - उरियाँ हीं है रखे...
रिश्तों के जो रेशे हैं रिसते हैं हर घड़ी...
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हत्थे से हीं उखड़ गई वो जड़ ये जान के
कि फूल-पत्तियों ने खुद को उससे लाज़िमी कहा...
तुम गए तो साथ मेरी मिट्टी भी तो ले गए..
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पत्थर या नमक दे जाती है,
हर लहर जो मुझ तक आती है...
मैं रेत के साहिल जैसा हूँ...
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राह में तेरी रखी होंगीं ये आँखें उम्र भर,
जब उतर आओ अनाओं से बता देना इन्हें...
सात जन्मों का समय है, कोई भी जल्दी नही...
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मुझे एक टीस ने ज़िंदा रखा है,
तुम्हें एक टीस से मरना पड़ा था...
मिटा दूँ टीस तो मर जाऊँ मैं भी...
- Vishwa Deepak Lyricist
ना चमड़ी है जो खून जने,
ना दमड़ी हीं जो सिंदुर दे..
ले भटकोइयां और मांग सजा...
*भटकोइयां = खर-पतवार श्रेणी का एक पौधा जिसपे "मटर-दाने" की तरह के फूल उगते है और जिन्हें फोड़ने पर लाल रंग निकलता है
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वो काटता है जब माटी को,
माटी-सा कटता जाता है...
सोना सोता है संसद में..
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गदगद हैं पूँछ उगाकर सब,
जो कल तक मुझ-से इंसां थे..
मैं जम्हूरियत का बागी हूँ...
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तालीम जहां की ऐसी है,
हर शख्स करैला नीम-चढा..
चुप्पी भी ज़हर उगलती है..
- Vishwa Deepak Lyricist