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Sunday, September 23, 2012

रिसते रिश्ते


कमाल का है पैरहन दुनिया की ज़ात का,
उधड़े कि या साबूत हो - उरियाँ हीं है रखे...

रिश्तों के जो रेशे हैं रिसते हैं हर घड़ी...

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हत्थे से हीं उखड़ गई वो जड़ ये जान के
कि फूल-पत्तियों ने खुद को उससे लाज़िमी कहा...

तुम गए तो साथ मेरी मिट्टी भी तो ले गए..

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पत्थर या नमक दे जाती है,
हर लहर जो मुझ तक आती है...

मैं रेत के साहिल जैसा हूँ...

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राह में तेरी रखी होंगीं ये आँखें उम्र भर,
जब उतर आओ अनाओं से बता देना इन्हें...

सात जन्मों का समय है, कोई भी जल्दी नही...

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मुझे एक टीस ने ज़िंदा रखा है,
तुम्हें एक टीस से मरना पड़ा था...

मिटा दूँ टीस तो मर जाऊँ मैं भी...

- Vishwa Deepak Lyricist