तेरी आँखें कारखाना हैं क्या,
अहसास कारीगर हैं जिनमें..
फिर रोज़-रोज़ का रोना क्यों?
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कभी शिकवों पे हँसते थे,
अभी हँस दें तो शिकवे हों..
गिरा है औंधे मुँह रिश्ता..
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कल पर निकल आएँगे कानों के भी,
आज सुन लो मुझे गर सुनना हो..
मैं बोल के उड़ जाऊँगा यूँ भी...
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उसे ग़म है कि उसकी खुशियों का कद छोटा है,
मुझे खुशी है कि ग़म की पकड़ कमज़ोर हुई..
मैं ज़िंदा हूँ और वो मरता है खुशी रखकर भी..
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कुछ झांकता है अंदर, कुछ भागता है बाहर,
मैं खुद से अजनबी-सा यह खेल देखता हूँ..
सीने में जंग छिड़ी है ईमां और बुज़्दिली में...
- Vishwa Deepak Lyricist
एरोप्लेन:
नाक नुकीली लिए फिर रहा
एरोप्लेन क्या सूंघ रहा है?
फाड़ के बादल रस पीएगा?
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बड़ी काई है आसमान में,
खुरपी लेकर चलो छील दें..
धार तेज़ है एरोप्लेन की..
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ज़िंदगी:
नींद तो दकियानूसी है,
खैर कि बागी है करवट..
प्यार जगाए रस्म तोड़ के...
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बचकानी है मेरी हँसी,
मेरा चुप रहना है सयानों-सा..
मेरा रोना... ज्ञान की चाभी है...
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खुश रहना बुरी लत है,
फिर कुछ भी बुरा नहीं दिखता....
खुश रहो कि "तुम" भी अच्छे हो..
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ज़िंदगी कंपकंपी से ज्यादा है,
मौत ओढूँ भी तो मिलेगा चैन नहीं..
खुदा! मौसम बदल या दे कंबल नया..
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कविता:
चार दिन क़लम न उठाऊँ तो उग आते हैं खर-पतवार,
बड़ी जल्दी रहती है मेरे शब्दों को ऊसर होने की..
कतरता हूँ, छांटता हू, फिर टांकता हूँ कागज़ पर..
- Vishwa Deepak Lyricist
बहुत हद तक जानता हूँ मैं तुम्हें,
तुम वही हो ना जो जानता है सब कुछ हीं...
ना ना, खुदा नहीं..खुशफहम हो..गप्पी हो..
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यक-ब-यक मैं बोल दूँ तुझको भी अपने-सा जो गर,
यक-ब-यक फिर तेरा भी अपना-सा मुँह हो जाएगा...
अपना-सा मुँह हो जाएगा तो खुद हीं मुँह की खाएगा...
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लिखने की ख्वाहिश छोड़ो भी,
लिखके ख्वाहिश बढ जाती है..
बढके ख्वाहिश मर जाती है..
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तुम्हें चाहिए हिन्दी! क्यों?
तुम्हें सा’ब नहीं बनना क्या?
'प्लीज़' कहो तो कृपा मिलेगी....
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उम्र झांक रही है तेरे चेहरे से,
खोल रही है जंग लगी खिड़कियाँ सभी..
नमी, नमक के गुच्छे हैं झुर्रियों के पीछे..
(अहसासों के सावन में ऐसे बंद न रहा करो)
- Vishwa Deepak Lyricist
हाँ ये ज़ाहिर है कि तू मेरा नहीं, उसका तो है,
उस खुदा का जिसने मेरा दिल है तेरा कर दिया...
क्या कहूँ इस कुफ़्र को- थोड़ी अदा, थोड़ी जफ़ा?
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तुम जीते-जी जी न पाए,
मैं मरता था, सो मर न पाया....
असर अलग पर हश्र एक-से..
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वह वहीं होता है जहाँ मेरी भनक बसती है,
वह वहीं होता है जहाँ मेरी तलब उठती है..
तलबगार भी वही है, तलब भी तो है वही...
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चलो दूरियों को अपनाएँ,
चलो खामखा झगड़ा कर लें..
यही दवा है ग़म-ए-इश्क़ की..
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मुद्दत हुई, मैंने तुझे देखा न उस तरह,
हरेक तरह देखा है पर, मुद्दत से तुझे हीं..
मुद्दत हुई हर इक तरह में "वह" तरह रखे...
- Vishwa Deepak Lyricist
कमाल का है पैरहन दुनिया की ज़ात का,
उधड़े कि या साबूत हो - उरियाँ हीं है रखे...
रिश्तों के जो रेशे हैं रिसते हैं हर घड़ी...
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हत्थे से हीं उखड़ गई वो जड़ ये जान के
कि फूल-पत्तियों ने खुद को उससे लाज़िमी कहा...
तुम गए तो साथ मेरी मिट्टी भी तो ले गए..
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पत्थर या नमक दे जाती है,
हर लहर जो मुझ तक आती है...
मैं रेत के साहिल जैसा हूँ...
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राह में तेरी रखी होंगीं ये आँखें उम्र भर,
जब उतर आओ अनाओं से बता देना इन्हें...
सात जन्मों का समय है, कोई भी जल्दी नही...
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मुझे एक टीस ने ज़िंदा रखा है,
तुम्हें एक टीस से मरना पड़ा था...
मिटा दूँ टीस तो मर जाऊँ मैं भी...
- Vishwa Deepak Lyricist
आज तोड़ डालो मुझे परत-दर-परत
कि मैं बामियान के बुद्ध-सा निर्लज्ज खड़ा हूँ..
होते में हूँ तुम्हारे, अहाते में हूँ तुम्हारे..
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इस बार मैं जो आऊँ तो मकसद न पूछना,
बस घर को घूर लेना, मैं लौट जाऊँ जब..
दो-चार गर्द होंगे कम, दो-चार रंग जियादा
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बस करवटों में रात चली जाएगी शायद,
मैं साहिलों पे डूबता-उठता हीं रहूँगा?
इन सलवटों में एक किनारा तो हो तेरा...
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लिफाफे जिस्म के खोले बहुत पर,
कहीं भी रुह की चिट्ठी पढी तूने नहीं...
खुदा ने "इश्क़" लिख भेजा था उनमें...
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न मैं "मेहमान" हो पाया उस घर का,
न तुम हीं "परिवार" हो पाई मेरी..
दोनों घर अजनबी हो गए..बस...
- Vishwa Deepak Lyricist
उतार दूँ ज़िंदगी का ये चोंगा,
कि पैरहन मौत के लाजवाब-से हैं..
बस इक आलस ने रोक रखा है मुझे...
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रात तिनके-सी उड़ती आती है और
चिमटे-सी खींच कर ले जाती है साँस को...
मैं जलाता हूँ या जलता हूँ - मालूम हीं नहीं चलता...
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हंगल साहब के लिए:
इक "सन्नाटे" ने छोड़ा शोर का साथ,
अब आवाज़ को ऊँगली पकड़ाए कौन?
वो गया तो अदब-ओ-सुकून ले गया..
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उतार ले मुझको मेरी इस ज़ात से,
कि मैं उकता गया हूँ ज़ब्त हो-हो के...
कभी अश्क़ों की बेड़ी तो कभी बीड़ा है सपनों का...
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ज़िंदगी दो घूँट लूँ
या ज़िंदगी से छूट लूँ...
इख्तियार खुद पे न इख्तियार आप पे....
- Vishwa Deepak Lyricist
मुझे मत दिखाओ सिगरेट का बुझा हुआ ठूंठ,
मैं खुद हीं जलके बुझता हूँ फिल्टर-सा हर समय...
सौ लफ़्ज़ गुजरते हैं.. जलती है शायरी तब..
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मानी छांट के लफ़्ज़ वो टांकता है पन्नों पे,
संवारके हर हर्फ़ फिर वह शायरी सजाता है..
चार "आह-वाह" लोग अर्थी पे डाल आते हैं...
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मैंने लिखते-लिखते चार-पाँच उम्रें तोड़ डालीं,
यह वक्त इसी हद तक मुझपे मेहरबान था...
कुछ और गर जो होता तो जीता मैं भी आज
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सोच हलक में अटकी है,
शब्द चुभे हैं सीने में..
दर्द की हिचकी आती है..
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क्या सुनेगा वो मेरी फरियाद को,
जो खुद हीं फरियादों से है लापता...
क्या ख़ुदा? कैसा ख़ुदा? किसका खु़दा?
- Vishwa Deepak Lyricist
तेरी आँखों में डूबा जब हीं,
तब से न उभर मैं पाया हूँ..
तेरी आँखें "ब्लैक होल" हैं री...
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बदरंग-सी थी हर शय अब तक,
तेरे कदम पड़े..रंग फैल गया..
तू हुस्न की "हिग्स बोसॉन" है क्या?
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हुनर मेरा लापता है तब से,
जब से हुआ मैं हुनरमंद हूँ...
शायर ने अब इश्क़ किया है....
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तेरा नाम आधा लिखकर तुझे सोचता हूँ मैं,
फिर सोचता हूँ कि ये पूरा नहीं मेरे बिना...
हर्फ़ थोड़े तुम भरो, हर्फ़ थोड़े मैं भरूँ....
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उसे अच्छा दिखने का शौक़ है
और मुझे... उसे देखने का..
ज़ौक़ दोनों का एक हीं तो है.
- Vishwa Deepak Lyricist
"स्वर्णाक्षरों" में लिखता इतिहास मुझे भी,
पर घूस देने के लिए पीतल भी ना मिला..
अब मेरे होने का नहीं है सच कहीं ज़िंदा...
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मैं झूठ की कतरन चुनता हूँ
और "शॉल" बनाता हूँ सच की..
वो ओढकर चुप हो जाते हैं...
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मेरे सच को सच का दस्तखत दे दो,
मेरे झूठ को गिरा दो मेरी नज़रों से...
मुझे बदलो या बदलो झूठा सच मेरा..
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बेबाकियों का जश्न मनाते थे हम कभी,
बेबाकियों के बोझ ने सूरत बिगाड़ दी...
उम्मीद बेवज़ह की थी अपने उसूल से..
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चट कर लो आ के मेरी सोच को भी
कि ये तेवर कागज पे थोड़े नरम हैं...
किया मैने लावा..लिखा बस शरर है..
- Vishwa Deepak Lyricist
ना चमड़ी है जो खून जने,
ना दमड़ी हीं जो सिंदुर दे..
ले भटकोइयां और मांग सजा...
*भटकोइयां = खर-पतवार श्रेणी का एक पौधा जिसपे "मटर-दाने" की तरह के फूल उगते है और जिन्हें फोड़ने पर लाल रंग निकलता है
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वो काटता है जब माटी को,
माटी-सा कटता जाता है...
सोना सोता है संसद में..
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गदगद हैं पूँछ उगाकर सब,
जो कल तक मुझ-से इंसां थे..
मैं जम्हूरियत का बागी हूँ...
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तालीम जहां की ऐसी है,
हर शख्स करैला नीम-चढा..
चुप्पी भी ज़हर उगलती है..
- Vishwa Deepak Lyricist