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Thursday, September 20, 2012

लफ़्ज़, कविता, ख़ुदा


मुझे मत दिखाओ सिगरेट का बुझा हुआ ठूंठ,
मैं खुद हीं जलके बुझता हूँ फिल्टर-सा हर समय...

सौ लफ़्ज़ गुजरते हैं.. जलती है शायरी तब..

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मानी छांट के लफ़्ज़ वो टांकता है पन्नों पे,
संवारके हर हर्फ़ फिर वह शायरी सजाता है..

चार "आह-वाह" लोग अर्थी पे डाल आते हैं...

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मैंने लिखते-लिखते चार-पाँच उम्रें तोड़ डालीं,
यह वक्त इसी हद तक मुझपे मेहरबान था...

कुछ और गर जो होता तो जीता मैं भी आज

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सोच हलक में अटकी है,
शब्द चुभे हैं सीने में..

दर्द की हिचकी आती है..

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क्या सुनेगा वो मेरी फरियाद को,
जो खुद हीं फरियादों से है लापता...

क्या ख़ुदा? कैसा ख़ुदा? किसका खु़दा?

- Vishwa Deepak Lyricist

Monday, July 30, 2012

धुम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है


तुमसे सीखता हूँ,
तुमसे जलता हूँ
और यूँ
भरता रहता हूँ अपने लफ़्ज़ों की ऐश-ट्रे...

तुम मुझे "रोल" करते रहो ऐसे हीं..

यह नशा मौत दे तो भी बेहतर..

बस तुम कभी
किसी कश में
आदतन
कह मत देना कि
"धुम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है"...

तुम "आइडल" हो मेरे
"गार्जियन" नहीं,
समझे ना!!

- Vishwa Deepak Lyricist