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Sunday, March 09, 2014

तुम्हारा मौन


आँखें मूंदो और महसूस करो -
ज़िंदगी तुम्हारे दो शब्दों के बीच के अंतराल में
कुलाचें भर रही है,
खिड़कियाँ खुली हैं आमने-सामने की
और
बहुत कुछ अनकहा गुजर रहा है
दीवारों की सीमाएँ तोड़कर..

मैंने कुछ कहा नहीं है,
फिर भी
ध्वनियों की अठखेलियाँ हैं तुम्हारे सीने में
और
तुम्हारा मौन जादूगर-सा
शून्य से उतार रहा है शब्द
टुकड़ों में...

आँखें मूंदो और महसूस करो-
गले के इर्द-गिर्द छिल रही है
शब्दों की चहारदीवारी
और
कई अहसास सशरीर पहुँच रहे हैं
तुम्हारे-मेरे बीच...

सुनो!
संभालकर रख लो इन्हें...

ये अपररूप हैं प्रेम के.....

इन्होंने मृत्यु को जीत लिया है!!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Sunday, December 02, 2012

एरोप्लेन, ज़िंदगी और कविता



एरोप्लेन:

नाक नुकीली लिए फिर रहा
एरोप्लेन क्या सूंघ रहा है?

फाड़ के बादल रस पीएगा?

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बड़ी काई है आसमान में,
खुरपी लेकर चलो छील दें..

धार तेज़ है एरोप्लेन की..

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ज़िंदगी:

नींद तो दकियानूसी है,
खैर कि बागी है करवट..

प्यार जगाए रस्म तोड़ के...

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बचकानी है मेरी हँसी,
मेरा चुप रहना है सयानों-सा..

मेरा रोना... ज्ञान की चाभी है...

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खुश रहना बुरी लत है,
फिर कुछ भी बुरा नहीं दिखता....

खुश रहो कि "तुम" भी अच्छे हो..

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ज़िंदगी कंपकंपी से ज्यादा है,
मौत ओढूँ भी तो मिलेगा चैन नहीं..

खुदा! मौसम बदल या दे कंबल नया..

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कविता:

चार दिन क़लम न उठाऊँ तो उग आते हैं खर-पतवार,
बड़ी जल्दी रहती है मेरे शब्दों को ऊसर होने की..

कतरता हूँ, छांटता हू, फिर टांकता हूँ कागज़ पर..

- Vishwa Deepak Lyricist

Wednesday, November 07, 2012

दो बाली धान


हंसिया को चाँद
या चाँद को हँसिया
कहने से
कविता तो बन जाएगी..... बात न बनेगी...

शब्द फसल से निकल आएँगे आगे
और
पूस की रात में ठिठुरता हल्कू
उन्हीं शब्दों की ओस में मरता रहेगा
दो बाली धान के लिए...

भले हीं
झंडों पर लहलहाएगा धान
लेकिन
हल्कू या होरी के पेट
खोखले हीं रह जाएंगें नारों और दोहों की तरह...

फिर किसी
जबरा की साँसों से लिपट कर सोएगा हल्कू
और हम
उस चौपाये को भैरव बाबा का अवतार कर देंगे घोषित..

पूजे जाएँगे बाबा,
लिखी जाएँगीं कविताएँ..

और नज़रों की 'ठेस' लिए कोने में पड़ा हीं रह जाएगा हमारा नायक......

- Vishwa Deepak Lyricist

Thursday, September 20, 2012

लफ़्ज़, कविता, ख़ुदा


मुझे मत दिखाओ सिगरेट का बुझा हुआ ठूंठ,
मैं खुद हीं जलके बुझता हूँ फिल्टर-सा हर समय...

सौ लफ़्ज़ गुजरते हैं.. जलती है शायरी तब..

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मानी छांट के लफ़्ज़ वो टांकता है पन्नों पे,
संवारके हर हर्फ़ फिर वह शायरी सजाता है..

चार "आह-वाह" लोग अर्थी पे डाल आते हैं...

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मैंने लिखते-लिखते चार-पाँच उम्रें तोड़ डालीं,
यह वक्त इसी हद तक मुझपे मेहरबान था...

कुछ और गर जो होता तो जीता मैं भी आज

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सोच हलक में अटकी है,
शब्द चुभे हैं सीने में..

दर्द की हिचकी आती है..

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क्या सुनेगा वो मेरी फरियाद को,
जो खुद हीं फरियादों से है लापता...

क्या ख़ुदा? कैसा ख़ुदा? किसका खु़दा?

- Vishwa Deepak Lyricist