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Sunday, May 18, 2014

साल भर पुरानी वह बात


साल भर पुरानी वह बात,
जिसकी उम्र महज एक साल है-
बड़ी हीं ताजी है।

मेरी ’बुक-सेल्फ’ की सबसे बोरिंग किताब में भी
भर गई थीं रंगीनियां...

आबाद हो चले थे
दिन-रात के कई ’अनाथ’ हिस्से..

नींद हो चली थी साझी
और ख्वाब पूरे..

अब बेफिक्री फिक्र देती थी
और फिक्र का बड़ा-सा बंडल
उतर गया था किन्हीं ’और’ दो आँखों में..
मेरे नाम के मायने भी बदल गए थे शायद..

तभी तो
भले पुकारा जाऊँ सौ बार;
चिढता न था...

सच में-
साल भर पुरानी वह बात,
जिसकी उम्र महज एक साल है-
बड़ी हीं ताजी है।

और हर पल जवां रखा है इसे
तुमने...
बस तुमने!!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Thursday, March 14, 2013

एक छटांक सूरज


मुँह अंधेरे
आँखों का आबनूसी रंग
उड़ेल दिया
मेरी उतरती पलकों पर..

शर्म से गुलाबी हो गए गाल
और लब सुर्ख..

तुमने डिंपलों में डुबोई
अपनी उंगलियाँ
और एक छटांक सूरज निकालकर
भर दी मेरी मांग..

एक बार फिर
फैल गया फागुन
चारों ओर..

काश!
हर दिन की होली यूँ हीं बनी रहे...

आमीन!!!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Tuesday, January 08, 2013

ओक भर की आँख में


नाटे कद की ज़िंदगी
फैलती है जा रही..

आसमां से बोल दो
नए रिश्ते ना बाँधा करे,
हाथ की ऊँचाई अब
है देह को छका रही..

नाटे कद की ज़िंदगी..

शाम की ढलान पे
हैं सुर्ख लब सिमट रहे,
ओक भर की आँख में
है रात छलछला रही..

नाटे कद की ज़िंदगी..

वो वहीं से बिन कहे
लौट गए आज भी,
हमने "प्यार" सुन लिया,
अब साँस बड़बड़ा रही..

नाटे कद की ज़िंदगी,
फैलती है जा रही...

- Vishwa Deepak Lyricist

Wednesday, December 05, 2012

उस तरह का प्यार


मैं तकरीबन हर उस किसी को प्यारा हूँ
जो मुझे "उस तरह" प्यार नहीं करती..

और जो करती थी बातें मुझे "उस तरह" प्यार करने की,
उसे इस तरह प्यारा हुआ मैं
कि आजकल
मुझसे नहीं करती बात तक;
शायद डरती है
कि कहीं कोई ठेस न लग जाए मुझे...

वह नहीं करती है बात
और यही बात मुझे चुभती है सबसे ज्यादा..

वे करती हैं बातें
जिन्हें मैं बहुत प्यारा हूँ,
लेकिन उनकी बातें मुझे न प्यार देती हैं और न हीं कोई ठेस..

अब सोचता हूँ
कि "प्यारा मानने" और "उस तरह प्यार करने" के बीच
क्यों है यह पुल
जो बदल देता है परिभाषा प्यार और ठेस की?

मैं पेंडुलम की तरह टहलते हुए इस पुल पर
कोसता हूँ उन्हें
जो या तो इस तरफ हैं या उस तरफ
और जो ज़मीन बाँट कर बैठी हुई हैं सौतनों की तरह...

मै ,
जिसे "प्यारा" कहने वाली "उस तरह" का प्यार नहीं करती,
फेरता हूँ निगाहें दोनों तरफों से
और कूद पड़ता हूँ
पुल के नीचे बहती
.
.
नफरत की नदी में...

इस नदी में
यकीन मानिए...... बेहद सुकून है....

- Vishwa Deepak Lyricist

Sunday, December 02, 2012

एरोप्लेन, ज़िंदगी और कविता



एरोप्लेन:

नाक नुकीली लिए फिर रहा
एरोप्लेन क्या सूंघ रहा है?

फाड़ के बादल रस पीएगा?

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बड़ी काई है आसमान में,
खुरपी लेकर चलो छील दें..

धार तेज़ है एरोप्लेन की..

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ज़िंदगी:

नींद तो दकियानूसी है,
खैर कि बागी है करवट..

प्यार जगाए रस्म तोड़ के...

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बचकानी है मेरी हँसी,
मेरा चुप रहना है सयानों-सा..

मेरा रोना... ज्ञान की चाभी है...

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खुश रहना बुरी लत है,
फिर कुछ भी बुरा नहीं दिखता....

खुश रहो कि "तुम" भी अच्छे हो..

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ज़िंदगी कंपकंपी से ज्यादा है,
मौत ओढूँ भी तो मिलेगा चैन नहीं..

खुदा! मौसम बदल या दे कंबल नया..

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कविता:

चार दिन क़लम न उठाऊँ तो उग आते हैं खर-पतवार,
बड़ी जल्दी रहती है मेरे शब्दों को ऊसर होने की..

कतरता हूँ, छांटता हू, फिर टांकता हूँ कागज़ पर..

- Vishwa Deepak Lyricist

Saturday, October 20, 2012

प्यार की मीठी चाय


तब रोया था वो...

पाँव लफ़्ज़ के उलझ पड़े थे,
छिटक के साँसें - सांय - गिरी थीं,
आँखों के फिर आस्तीन पर
प्यार की मीठी चाय गिरी थी,
बर्फ ख्वाब के पिघल गए तब,
पलक से बूँदें हाय, गिरी थीं..

हाँ, रोया था वो...

- Vishwa Deepak Lyricist

Wednesday, September 19, 2012

गिद्ध घरों पे बैठे तो


पत्थर या नमक दे जाती है,
हर लहर जो मुझ तक आती है...

मैं रेत के साहिल जैसा हूँ...

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वह उड़ते-उड़ते बैठ गया मेरी आँखों में,
तब से हीं मेरी आँखों में कोई ख्वाब नहीं...

गिद्ध घरों पे बैठे तो मौत का आलम होता है..

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इश्क़ की बेरूखियों को रखता आया पन्नों पे,
सर पटक के आज हर्फ़ों ने किया है आत्मदाह..

मैं जलूँ या तुझको सीने से निकालूँ, तू हीं कह..

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सुबह से तुम्हारी यादों की हो रही हैं उल्टियाँ,
एक "हिचकी" की दवा दे जाओ कि चैन आए..

याद कर-करके मुझे मार हीं दो तो बेहतर हो..

_________________


तुम सुधर गए हमें बिगाड़ते-बिगाड़ते,
हम उधड़ गए तुम्हें संवारते-संवारते..

प्यार तो था हीं नहीं, बस नीयतों की जंग थी...

- Vishwa Deepak Lyricist

Monday, September 17, 2012

ऑस्मोसिस , रिवर्स-ऑस्मोसिस


एक झिल्ली है पतली
जिसकी एक ओर है तुम्हारा होना,
दूसरी ओर - न होना
और जिनमें भरे हैं द्रव
प्यार और नफरत के...

तुम बदलती रहती हो
घनत्व इन द्रवों के..

बदलती रहती हैं परिस्थितियाँ..

बदलता रहता हूँ मैं भी
और होता रहता हूँ
इस-उस पार
"ऑस्मोसिस" या "रिवर्स-ऑस्मोसिस" की बदौलत...

इस तरह
रिश्ते की वह पतली झिल्ली
झेलती रहती है
"सोल्वेंट", "सोल्युट" का खेल
और मज़े लेता रहता है "मनो""विज्ञान".....

- Vishwa Deepak Lyricist

Wednesday, July 04, 2012

चलो


चलो चाँद की चाहरदीवारी तोड़ आएँ,
चलो लूट लें एकबारगी हक़ शायरों का...

चलो जाग लें जुगनू की रोशनी तले,
चलो छीन लें खामोशियाँ सब रात से...

चलो जान लें है जानलेवा ज़िंदगी,
चलो जान दे के मौत से रेहन छुड़ा लें...

चलो बात कर के शब्द को बेमानी कर दें,
चलो शांत रह के छोड़ दें सागर नदी में...

चलो नींद पी के ख्वाब को जबरन उठा लें,
चलो ख्वाब ला के नींद को जी भर धुनें...

चलो आस रख के फिर से लुट जाएँ यहाँ,
चलो प्यार कर के आखिरी जेवर गवां दें...

चलो...

चलो चाँद की चाहरदीवारी तोड़ आएँ...
चलो प्यार कर के आखिरी जेवर गवां दें...

- Vishwa Deepak Lyricist

Thursday, February 09, 2012

अब तुम भी जान लो

तु्म्हें जानते-जानते 
भूल गया हूँ खुद को 
ठीक उसी तरह
जिस तरह 
दरिया सौंप दे अपना होना समंदर को.. 


मैं पत्ते की लकीरों में लेता रहता हूँ साँस, 
तुम जड़ बनके डालती रहती हो 
मेरे सीने में ईंधन.. 


मैं पल-दर-पल धूप बेलता हूँ
और तुम 
चंपई रंग लेकर उतर आती हो उसमें 
अपनी सारी उष्मा-सहित; 
दिन ऐसे हीं तो बुनते हैं हम.. 


मैं लिखता हूँ नज़्म - 
डुबोता हूँ तुम्हारी हँसी में अपनी लेखनी 
और उकेर देता हूँ तुम्हारे होठों पर 
दो-चार अनकहे अल्फ़ाज़; 
तुम्हारे होठों से झड़े ये नज़्म 
खिल जाते हैं क्यारी-क्यारी.. 


तुम अब भी अनबूझ हो 
या शायद बूझ गया हूँ तुम्हें - 
मालूम नहीं 
पर 
रात के इक्के पर 
चढकर 
तुम जब आती हो मेरी आँखों में 
तो 
चाँद के दो चक्के 
मेरे दिल तक बढ आते हैं;
इश्क़ यकीनन यही है - 
इतना तो जान गया हूँ.. 


अब तुम भी जान लो!!!

Tuesday, April 20, 2010

तो क्या करिए..


इफ़रात में गर इनकार मिले,
तो क्या करिए जब प्यार मिले.......

जब नगद की भद ना बची रहे,
मोहलत की हद ना बची रहे,
जुर्रत की ज़द ना बची रहे,
ठीक तभी
हाँ ठीक तभी
संगदिल साहूकारों के
हीं साथ खड़े होशियारों से
बिना किसी मियाद के हीं
उधार मिले
तो क्या करिए....

इज़हार की शक्ल से अंजाने
किसी आशिक़ को
औनी-पौनी हीं सही
मगर
"हामी" की हूर का किसी डगर
दीदार मिले
तो क्या करिए...

जिसे
इफ़रात में बस इनकार मिले,
इंतज़ार मिले...इंतज़ार मिले,
वो जी उट्ठे या मर जाए
जो नज़र कभी इक बार मिले...

तो क्या करिए जब प्यार मिले?


-विश्व दीपक