ऐसी क्या कंगाली है?
मृत्यु की बिकवाली है।
जिसके घर का लाल गया,
वह भी क्यों बेहाल हुआ?
TRP के पागल-हाथों में
घुट-घुटकर बदहाल हुआ।
वह था कई नज़रों का दीपक,
पढा लिखा बेजोड़ विचारक,
इतना घिसा गया उसके जाने को
....यादों पर चढ़ बैठे दीमक।
NASA छुपा, नशा खुल गया,
Moon ऊपर अवगुण ढुल गया,
नीत्शे और सात्र बिला गए,
Split से दर्शनशास्र धुल गया।
हासिल क्या हीं हुआ पिता को?
मौत सही , बदनामी सहो।
'अनर्गल' मीडिया के लिए तो
यह रोज़ की कव्वाली है,
मृत्यु की बिकवाली है।
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Tuesday, November 03, 2020
Monday, September 17, 2012
ऑस्मोसिस , रिवर्स-ऑस्मोसिस
एक झिल्ली है पतली
जिसकी एक ओर है तुम्हारा होना,
दूसरी ओर - न होना
और जिनमें भरे हैं द्रव
प्यार और नफरत के...
तुम बदलती रहती हो
घनत्व इन द्रवों के..
बदलती रहती हैं परिस्थितियाँ..
बदलता रहता हूँ मैं भी
और होता रहता हूँ
इस-उस पार
"ऑस्मोसिस" या "रिवर्स-ऑस्मोसिस" की बदौलत...
इस तरह
रिश्ते की वह पतली झिल्ली
झेलती रहती है
"सोल्वेंट", "सोल्युट" का खेल
और मज़े लेता रहता है "मनो""विज्ञान".....
- Vishwa Deepak Lyricist
Saturday, September 15, 2012
हुस्न-ओ-इश्क़
तेरी आँखों में डूबा जब हीं,
तब से न उभर मैं पाया हूँ..
तेरी आँखें "ब्लैक होल" हैं री...
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बदरंग-सी थी हर शय अब तक,
तेरे कदम पड़े..रंग फैल गया..
तू हुस्न की "हिग्स बोसॉन" है क्या?
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हुनर मेरा लापता है तब से,
जब से हुआ मैं हुनरमंद हूँ...
शायर ने अब इश्क़ किया है....
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तेरा नाम आधा लिखकर तुझे सोचता हूँ मैं,
फिर सोचता हूँ कि ये पूरा नहीं मेरे बिना...
हर्फ़ थोड़े तुम भरो, हर्फ़ थोड़े मैं भरूँ....
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उसे अच्छा दिखने का शौक़ है
और मुझे... उसे देखने का..
ज़ौक़ दोनों का एक हीं तो है.
- Vishwa Deepak Lyricist
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