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Saturday, September 25, 2010
जी का जंजाल
ज़िंदगी जी का जंजाल हो चली है,
मौत भी ससुरी मुहाल हो चली है..
न राशन रसद में,
न ईंधन रसद में,
न महफ़िल हीं जद में,
न मंज़िल हीं जद में,
ना पग ना पगडंडी,
सौ ठग हैं सौ मंडी,
दिल ठंढा, जां ठंढी,
शक्ति की सौं... चंडी
भी अब तो बेबस बेहाल हो चली है..
ज़िंदगी जी का जंजाल हो चली है..
न चेहरा हीं सच्चा,
न सीसा हीं सच्चा,
या किस्मत दे गच्चा,
या हिम्मत दे गच्चा..
जो थम लूँ तो अनबन,
जो बढ लूँ तो अनशन,
जो दम लूँ तो मंथन,
गंवा के सब अनधन
ये धरती तो अब पाताल हो चली है...
ज़िंदगी जी का जंजाल हो चली है..
-विश्व दीपक
Tuesday, May 18, 2010
तेरे भरोसे
मुझे कहाँ जीने का हुनर है!
तेरे भरोसे मेरा बसर है।
तू हीं बता दे संभालूँ कैसे,
तुझी पे अटकी मेरी नज़र है।
तेरे अलावे भी एक जहां है,
जिसे पता हो, कहे किधर है?
तुझे न देखूँ तो कुछ करूँ भी,
तुझे न देखूँ.. यही दुभर है।
मुझे अगर है गुमां तो ये भी,
तेरी अदाओं का हीं असर है।
तू हीं वज़ह है दीवानेपन की,
बुरा तो ये कि तुझे खबर है।
इसे हक़ीक़त कहूँ या धोखा,
मेरे लबों पर तेरी मुहर है।
कोई गनीमत थी जो कि आखिर
तेरे हवाले हीं मेरा सर है।
मुझे गंवा के ना रह सकोगी,
मेरे बिना तो सफर सिफर है।
मुझे न ’तन्हा’ समझना क्योंकि
चाहे न चाहे तू हमसफर है।
-विश्व दीपक
Tuesday, April 20, 2010
तो क्या करिए..
इफ़रात में गर इनकार मिले,
तो क्या करिए जब प्यार मिले.......
जब नगद की भद ना बची रहे,
मोहलत की हद ना बची रहे,
जुर्रत की ज़द ना बची रहे,
ठीक तभी
हाँ ठीक तभी
संगदिल साहूकारों के
हीं साथ खड़े होशियारों से
बिना किसी मियाद के हीं
उधार मिले
तो क्या करिए....
इज़हार की शक्ल से अंजाने
किसी आशिक़ को
औनी-पौनी हीं सही
मगर
"हामी" की हूर का किसी डगर
दीदार मिले
तो क्या करिए...
जिसे
इफ़रात में बस इनकार मिले,
इंतज़ार मिले...इंतज़ार मिले,
वो जी उट्ठे या मर जाए
जो नज़र कभी इक बार मिले...
तो क्या करिए जब प्यार मिले?
-विश्व दीपक
Monday, April 19, 2010
हुनर
मुझे बस ये हुनर दे दे,
मेरे कांधों पे सर दे दे।
निभा लूँगा मैं तारों से,
मुझे बस तू सिफर दे दे।
बुझी जाती है आवाज़ें,
निगाहों में शरर दे दे।
भिड़ूँ कैसे बिसातों से,
दलीलों के भंवर दे दे।
यूँ हीं तन्हा गुजर कर लूँ,
मुझे जो तू जिगर दे दे।
-विश्व दीपक
Friday, April 09, 2010
क्या खूब है ये दूब भी...
क्या खूब है ये दूब भी....
शबनम जो होठों पे ढले
तो हल्की तबस्सुम खिले,
फिर लोक-लाज भूल ये,
रेशम की चादर ओढ ले..
तलवार-सी यह दूब तब
बिछ जाए है पैरों तले...
एक बावला बेहोश-सा
जब इसके सीने को दले,
सह जाए ये सब दर्द हीं,
क्या जाने इसको क्या मिले,
फिर बावली यह दूब तब
खुद की हीं खुशियाँ तोड़ ले
और बेरहम कातिल की दो
आँखों को रौशन कर चले..
अपने जहां को राख कर
ज़ख्मों को रखके ताख पर
अपनों के वास्ते ये जब
हर सुबह मिट्टी में गले,
उस वक्त इसकी अहमियत
लगती "मेरे महबूब"-सी..
क्या खूब है ये दूब-भी...
इस रचना से मैंने "उपमा" को "उपमेय" और "उपमेय" को "उपमा" बनाने की कोशिश की है... यह पता करना आपकी जिम्मेवारी है कि "दूब" और "महबूब" में "उपमा" कौन है और "उपमेय" कौन? :)
-विश्व दीपक
कि ये हसरत तो हल्की है..
बड़ी तीखी ये तल्खी है,
तेरी नज़रों से छलकी है....
ये मुझसे रंज है तेरा ,
या ये चाहत की झलकी है?
मैं इनमें जज्ब हो जाऊँ,
कि ये हसरत तो हल्की है !!!
जां देकर लूँ हँसी तेरी,
या ये कीमत भी कल की है?
लुटा ना होश गैरों पे,
कि ये दौलत तो पल की है...
बड़ी तीखी ये तल्खी है,
तेरी नज़रों से छलकी है....
-विश्व दीपक
Wednesday, March 31, 2010
तुम हो क्या..
मुखड़ा
साँसों की दूरियाँ
मुझको तो भाए ना।
आँखों की चोरियाँ
अब सही जाए ना।
साँसों की दूरियाँ
मुझको तो भाए ना।
आँखों की चोरियाँ
अब सही जाए ना।
बेताबियाँ
क्यूँकर यहाँ हैं,
खामोशियाँ
क्यूँ हैं यहाँ,
गुस्ताखियाँ
तुम कुछ करो ना,
माने ना
दिल ये मेरा।
तुम हो क्या,
रब की दुआ,
गुमसुम हो,
क्यों हो खफ़ा।
तुम हो क्या,
रब की दुआ,
गुमसुम हो,
क्यों हो खफ़ा..
बेवज़ह................
अंतरा 1
मुझको बता, मेरी खता, यूँ ना सता, जाँ,
मुझमें खोके, चाहत के पल, जी ले आ, ज़रा।
मुझको बता, मेरी खता, यूँ ना सता, जाँ,
मुझमें खोके, चाहत के पल, जी ले आ, ज़रा।
अंतरा 2
हो ना कैसे, ख्वाहिश तेरी ,चाहूँ तुझे, जो,
तेरे बिन तो, जीना यूँ है, जी हीं ज्यों न, हो।
हो ना कैसे, ख्वाहिश तेरी ,चाहूँ तुझे, जो,
तेरे बिन तो, जीना यूँ है, जी हीं ज्यों न, हो।
-विश्व दीपक
Thursday, February 25, 2010
मन बता
मुखड़ा
male:
मन जाने ये अनजाने-से अफ़साने जो हैं,
समझाने को बहलाने को बहकाने को हैं..
मन तो है मुस्तफ़ा,
मन का ये फ़लसफ़ा,
मन को है बस पता..
मन होके मनचला,
करने को है चला,
उसपे ये सब फिदा..
female:
मन बता मैं क्या करूँ क्या कहूँ मैं और किस.. अदा से?
मन बता मैं क्या करूँ क्या कहूँ मैं और किस.. अदा से?
अंतरा
male:
जाने कब से चाहा लब से कह दूँ,
पूरे दम से जाके थम से कह दूँ,
आके अब कहीं,
माने मन नहीं,
मन का शुक्रिया....
female:
ओठों को मैं सी लूँ या कि खोलूँ, मन बता
आँखों से हीं सारी बातें बोलूँ, मन बता
आगे जाके साँसें उसकी पी लूँ, मन बता
बैठे बैठे मर लूँ या कि जी लूँ, मन बता..
बस कह दे तू तेरा फ़ैसला,
बस भर दे तू जो है फ़ासला..
मन बता मैं क्या करूँ क्या कहूँ मैं और किस.. अदा से?
मन बता मैं क्या करूँ क्या कहूँ मैं और किस.. अदा से?
-विश्व दीपक
Saturday, February 20, 2010
रिश्तों का पनीर
कल तक जिसे सँवारने की फ़िक्र थी मुझे,
उधड़ी वो इस कदर कि मुझे रास आ गई।
शायद इसी को कहते हैं, ऐ यार, ज़िंदगी,
जब-जब किया जुदा, ये मेरे पास आ गई।
जाने ये कौन आए हैं मुझको तराशने,
कातिल की आँखों में है चमक खास आ गई।
बंजर था दिल जभी तो बेकार था अगर,
बदतर है अब जो जंगली ये घास आ गई।
मुद्दत से तूने ’तन्हा’ यूँ सहेजा था जिसे,
रिश्तों के उस पनीर में अब बास आ गई।
-विश्व दीपक
Thursday, February 18, 2010
चाहत की चरस
यही है अहद तुझे तकके मैं आहें न भरूँगा,
मालूम है कि मुझसे तो निभती नहीं कसमें।
एक शौक है दिल ज़ार-ज़ार होने पर हँसना,
इसी शौक से तो आज भी है ज़िंदगी नस में।
इस बार भी किसी माहरू ने ओढा है चेहरा,
बस देखिए उल्काएँ कब जलती हैं हवस में।
तुझे जानता ऐन वक्त तो बनता न दीवाना,
ज़ाहिर है बेवफ़ाई प’ अब दिल नहीं बस में।
लुट जाएगा ’तन्हा’ अगर सुधरेगा नहीं तो,
माना कि नशा है बड़ा चाहत की चरस में।
-विश्व दीपक
Monday, February 08, 2010
मैं अब भी
मैं अब भी उसे बुरा नहीं कहता...
वो जो
आँखों के सामने रहके तड़पाती है,
बारहा आँखों के पीछे भी उतर आती है
ख्वाबों के झरोखे से
और उड़ा जाती है नींद.......
मैं नींद में भी उससे कुछ कह नहीं पाता...
बस सुनता रहता हूँ उसकी जबां..
जो
चुटखी भर हिन्दी,
नाखून भर पंजाबी
और हथेली भर अंग्रेजी
का पुट लिए रहती है....
क्या कुछ कह जाती है वो...
मुझे उसकी बातें सुनाई नहीं पड़ती,
हाँ
इतना होता है कि
उसके लबों की जुंबिश,
लबों की लरजिश
जम जाती है सीने में .....
और मेरी धड़कन
मेरा साथ छोड़ने लगती है...
ठीक वैसे हीं
जैसे
उसे देखते वक्त होता है........
मैं तब भी कोई शिकायत नहीं करता..
मैं तब भी उसे बुरा नहीं कहता..
-विश्व दीपक
Tuesday, January 26, 2010
इश्क़ आग है..
इश्क़ आग है,
जहर-बुझे नज़रों से घायल
आशिक के साँसों का झाग है..
बड़ी बेरहम इसकी लत है,
परचम-परचम हर कोने में,
मौत की मानो, जीत नियत है..
इस शरीर-से इश्क़ की जबसे
दिल-दरवेश से हुई सोहबत है,
भूल गया दिल खुदा-खुदाई,
धड़कन में भी बस गफ़लत है,
माँगता था जो दुआ जान की
अब दूजे से हीं निस्बत है,
दर-दर उसका नाम पुकारे,
हर नुक्कड़ की यह तोहमत है,
खून भरे यह रगों में जब भी
ख्वाब धरे, बोले बरकत है,
जान पड़ी आफत में अब तो
हुई बेहया हर हरकत है,
छोड़ न दे जां हाड़-माँस को
चार-पाँच पल की मोहलत है,
बड़ी बेरहम इसकी लत है....
भाँग-भरे फ़ागुन में पागल
बेवा के होठों का फ़ाग है,
इश्क़ आग है!!
-विश्व दीपक
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