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Sunday, March 09, 2014

तुम्हारा मौन


आँखें मूंदो और महसूस करो -
ज़िंदगी तुम्हारे दो शब्दों के बीच के अंतराल में
कुलाचें भर रही है,
खिड़कियाँ खुली हैं आमने-सामने की
और
बहुत कुछ अनकहा गुजर रहा है
दीवारों की सीमाएँ तोड़कर..

मैंने कुछ कहा नहीं है,
फिर भी
ध्वनियों की अठखेलियाँ हैं तुम्हारे सीने में
और
तुम्हारा मौन जादूगर-सा
शून्य से उतार रहा है शब्द
टुकड़ों में...

आँखें मूंदो और महसूस करो-
गले के इर्द-गिर्द छिल रही है
शब्दों की चहारदीवारी
और
कई अहसास सशरीर पहुँच रहे हैं
तुम्हारे-मेरे बीच...

सुनो!
संभालकर रख लो इन्हें...

ये अपररूप हैं प्रेम के.....

इन्होंने मृत्यु को जीत लिया है!!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Sunday, January 13, 2013

तुम्हारी मुहर लगी साँसें


वो तुम्हारे लबों से "हाय, मर जावां" का फूटना
और मेरा मर जाना.. उसी दम...

याद रहेगा मुझे आवाज़ों का दौर गुजर जाने के बाद भी..

तुम बस इन छल्लेदार लबों से चूमती रहना हवाएँ,
मैं तुम्हारी मुहर लगी उन साँसों की बदौलत जीता-मरता रहूँगा...

बस तुम इशारों के उस दौर में मत भूलना
"हाय" कहना आँखों से,
मैं पढ लूँगा तुम्हारी अदाएँ टटोलकर "ब्रेल लिपि" में
और
और
मर जाऊँगा फिर से.......उसी दम

- Vishwa Deepak Lyricist

Wednesday, June 20, 2012

फिसलन


अब कि
तुम्हारे फिसलनदार कोटरों में
वह माद्दा नहीं कि
मेरी परछाई तक तो थाम सकें...

ये तुम्हारी दो "गज़ाल-सी आँखें"
नदी भर-भर रोती रहें

या डूब मरें उन्हीं में,
मैं किनारे के पत्थर-सा
बैठा रहूँगा वहीं,
भले तुम भिंगोती रहो मुझे,
लेकिन मैं न राह दूँगा... न हीं हाथ...
हाँ, इतनी मेहरबानी करूँगा
कि
जब तुम सर या पैर दे मारो मुझपे,
तो मैं
सहेज के रख लूँ खून के कुछ कतरे
जो यकीनन हैं मेरे हीं...

याद है? -
मेरी उस दुनिया
की चूने वाली दो दीवारों पर
कत्थई रंग से तुमने लिखा था
मेरा नाम कभी
और मैं हर बार अपने नाम के रस्ते
तुम्हारे नाम, तुम्हारी पहचान में उतर आता था
और इस तरह मुकम्मल हो जाता था मैं,
मुझे लगता था
कि दो पहचानों ने एक पहचान को जना है...

तुमने न जाने कब
उन दीवारों में खिड़कियाँ ठूंस डालीं,
न जाने कितनी बार
खुल चुकीं है वे खिड़कियाँ अब तक..
आह!
कत्थई को कालिख कर दिया तुमने!!!

अब
तुम्हारी इन फिसलनदार कोटरों में
वही ठहर सकता है
जो नाखून टिका दे इनकी ज़मीं पे
या छील आए इन्हें
जैसे कोई हटाता है
काई अपने आंगन से..

मैं न कर पाऊँगा ऐसा
क्योंकि इन कोटरों में
कभी रहा था मैं
अपना हक़ जानकर...

- Vishwa Deepak Lyricist

Thursday, February 09, 2012

अब तुम भी जान लो

तु्म्हें जानते-जानते 
भूल गया हूँ खुद को 
ठीक उसी तरह
जिस तरह 
दरिया सौंप दे अपना होना समंदर को.. 


मैं पत्ते की लकीरों में लेता रहता हूँ साँस, 
तुम जड़ बनके डालती रहती हो 
मेरे सीने में ईंधन.. 


मैं पल-दर-पल धूप बेलता हूँ
और तुम 
चंपई रंग लेकर उतर आती हो उसमें 
अपनी सारी उष्मा-सहित; 
दिन ऐसे हीं तो बुनते हैं हम.. 


मैं लिखता हूँ नज़्म - 
डुबोता हूँ तुम्हारी हँसी में अपनी लेखनी 
और उकेर देता हूँ तुम्हारे होठों पर 
दो-चार अनकहे अल्फ़ाज़; 
तुम्हारे होठों से झड़े ये नज़्म 
खिल जाते हैं क्यारी-क्यारी.. 


तुम अब भी अनबूझ हो 
या शायद बूझ गया हूँ तुम्हें - 
मालूम नहीं 
पर 
रात के इक्के पर 
चढकर 
तुम जब आती हो मेरी आँखों में 
तो 
चाँद के दो चक्के 
मेरे दिल तक बढ आते हैं;
इश्क़ यकीनन यही है - 
इतना तो जान गया हूँ.. 


अब तुम भी जान लो!!!

Saturday, December 10, 2011

काहे के संकोची

वो काहे के संकोची हैं... 


वो तो 
नज़र डाल के जिगर चीर दें, 
उधर आह लें , इधर चीर दें, 
ज़रा प्यार दें, बड़ी पीर दें, 
दुआ प्यार दें, जड़ी पीर दें.. 


उफ़्फ़! 
खुले वहीं, दिल खोल रखें, 
कई किस्म-किस्म के बोल रखें.. 
फिर 
राह बना के कदम डाल लें, 
मेरी वहीं फिर कदम-ताल लें.. 


अब 
पाँव खींच कर, आँख मींच कर, 
बरस रहे हैं साँस भींच कर, 
रीत-रिवाज़ सूझी है अब जब, 
आन-अना करती हैं अब-तब.. 


आह! 
मंज़िल तक यूँ मुझे बढा के, 
नाक उठा के, नाज़ चढा के, 
चाह रहें मैं जहां वार दूँ, 
जान मिटाऊँ, हया वार दूँ... 


हाय! 
कहूँ कहे जो, सुनकर, मैं था, 
कहूँ राह का बुनकर मैं था, 
खेंच लाया था उनको मैं हीं, 
पेंच लड़ाई थी मैंने हीं... 


वाह! 
आगे बढ के इश्क़ करे जो, 
संकोची काहे का फिर वो... 
बस 
ग़ज़ब के वो उत्कोची हैं, 
वो काहे के संकोची हैं...


- विश्व दीपक

Monday, February 07, 2011

बतियाँ बनाओ न जी


रास न आए मोहे खाली खाली रतियाँ,
बतियाँ बनाओ न जी, आके करो बतियाँ...

साज सुहाए ना हीं, बोल हीं भाए मोहे,
कैसे रचूँ गीत सखी! कैसे लिखूँ पतियाँ..

पतियाँ न भेजे पिया, दरश दिखाए ना हीं,
जाने कैसे धड़के है, दोनों हीं की छतियाँ..

बैठी जाए छाती मोरी, सूजी जाए अखियाँ,
रास न आए मोहे खाली खाली रतियाँ...

बतियाँ बनाओ न जी, आके करो बतियाँ..


-विश्व दीपक

Saturday, May 22, 2010

मोसे मान करे है मन मोरा..


मोसे मान करे है मन मोरा!!

दिन-संझा गुजरे फिर जब हीं
कजरारी रैन फ़फ़क जाए,
तोसे लजा-लजा के चंदा तब
अंबर पे उचक-उचक जाए,
देह बचा-बचा बिजली कड़के
तू तके जो आग धधक जाए,
भय खाए कोई, शरमाए कोई
कोई सामने आके छक जाए,
ऐसे में निगोड़ी प्रीत तभी
मोहे देके तोरी ललक जाए..

अब का करिए जब तोपे हीं
अंखियन की आस अटक जाए
अब का करिए जब मन मोरा
तोहे निरख-निरख के थक जाए..

मैं तरह-तरह के करूँ जतन
ताकि तोरा जियरा धड़क जाए,
न्योछार करूँ मैं लाख जनम
तबहुँ न तोरी झिझक जाए.....

हाय! अब और करूँ भी क्या?
अंसुवन के संग धरूँ भी क्या?
निर्मोही तू! तोहे का फिकर
मैं मन मारूँ या मरूँ भी क्या?

एक बात है मन में कचोट रही,
कि तोरे हीं मन में थी खोट रही,
फिर मैं काहे मर जाऊँ भला,
जब गलती तोरे माथे लोट रही..

सो मन के मोम जलाए दियो
मैंने इशक के होम जलाए दियो,
नैनन में बसी तोरी मूरत के
मैंने एक-एक रोम जलाए दियो..

अब ये क्या! कैसा नया किस्सा,
मोरा मन माँगे मोसे हिस्सा,
मुआ.. अब भी तोरा ध्यान करे,
मोरा मन...... मोसे हीं मान करे!!
मोरा मन...... मोसे हीं मान करे!!

मोसे मान करे है मन मोरा,
तोहे मानत है, मोसे बिफरत है,
हाय! बावरा है.... थोड़ा-थोड़ा!!


-विश्व दीपक

Tuesday, May 18, 2010

तेरे भरोसे


मुझे कहाँ जीने का हुनर है!
तेरे भरोसे मेरा बसर है।

तू हीं बता दे संभालूँ कैसे,
तुझी पे अटकी मेरी नज़र है।

तेरे अलावे भी एक जहां है,
जिसे पता हो, कहे किधर है?

तुझे न देखूँ तो कुछ करूँ भी,
तुझे न देखूँ.. यही दुभर है।

मुझे अगर है गुमां तो ये भी,
तेरी अदाओं का हीं असर है।

तू हीं वज़ह है दीवानेपन की,
बुरा तो ये कि तुझे खबर है।

इसे हक़ीक़त कहूँ या धोखा,
मेरे लबों पर तेरी मुहर है।

कोई गनीमत थी जो कि आखिर
तेरे हवाले हीं मेरा सर है।

मुझे गंवा के ना रह सकोगी,
मेरे बिना तो सफर सिफर है।

मुझे न ’तन्हा’ समझना क्योंकि
चाहे न चाहे तू हमसफर है।


-विश्व दीपक

Tuesday, April 20, 2010

तो क्या करिए..


इफ़रात में गर इनकार मिले,
तो क्या करिए जब प्यार मिले.......

जब नगद की भद ना बची रहे,
मोहलत की हद ना बची रहे,
जुर्रत की ज़द ना बची रहे,
ठीक तभी
हाँ ठीक तभी
संगदिल साहूकारों के
हीं साथ खड़े होशियारों से
बिना किसी मियाद के हीं
उधार मिले
तो क्या करिए....

इज़हार की शक्ल से अंजाने
किसी आशिक़ को
औनी-पौनी हीं सही
मगर
"हामी" की हूर का किसी डगर
दीदार मिले
तो क्या करिए...

जिसे
इफ़रात में बस इनकार मिले,
इंतज़ार मिले...इंतज़ार मिले,
वो जी उट्ठे या मर जाए
जो नज़र कभी इक बार मिले...

तो क्या करिए जब प्यार मिले?


-विश्व दीपक

Saturday, April 03, 2010

खुदाया


मुखड़ा

वादो की बगिया को कैसे भरूँ,
सपनों की नदिया में कब तक बहूँ,
वादो की बगिया को कैसे भरूँ,
सपनों की नदिया में कब तक बहूँ।

मेरा साहिल वही है,
वो ग़ाफ़िल नहीं है,
मेरा साहिल वही है,
वो गाफ़िल नहीं है।

दिलासा ये हासिल मैं कैसे करूँ
खुदाया.........

अंतरा 1

इशारा कोई तो नज़र से हो,
नज़ारा कोई तो उधर से हो,

इशारा कोई तो नज़र से हो,
नज़ारा कोई तो उधर से हो।

चाहत दम-ब-दम,
संग-संग उस-सा हम-कदम,

दिलासा ये हासिल मैं कैसे करूँ,
खुदाया.........

अंतरा 2

सवेरा कभी तो अलग-सा हो,
बसेरा कभी तो फ़लक-सा हो,

सवेरा कभी तो अलग-सा हो,
बसेरा कभी तो फ़लक-सा हो।

मन्नत दम-ब-दम,
संग-संग उस-सा हम-सुखन,

दिलासा ये हासिल मैं कैसे करूँ,
खुदाया.........


-विश्व दीपक

ये सारी सुबहें


मुखड़ा

ये सारी सुबहें , शामें ,रातें,
हैं शायद तेरी मेरी बातें,
जो हल्के से मचल के कहकशों में
पुल बनाएँ।

ये तेरे शिकवे, वादे, नाले
हैं बेशक मय के महके प्याले,
जो छलके तो संभल के ख्वाहिशों के
गुल खिलाएँ।

अंतरा 1

मैं हूँ वो तू है,
चाहत हर सू है,
फिर क्या ज़िक्र हो,
यह तो ज़ाहिर है,
रब भी माहिर है,
फिर क्यों फ़िक्र हो।

मैं हूँ वो तू है,
चाहत हर सू है,
फिर क्या ज़िक्र हो,
यह तो ज़ाहिर है,
रब भी माहिर है,
फिर क्यों फ़िक्र हो।

ये तेरे शिकवे, वादे, नाले
हैं बेशक मय के महके प्याले,
जो छलके तो संभल के ख्वाहिशों के
गुल खिलाएँ।

अंतरा 2

गुमसुम महफ़िल को,
प्यासे साहिल को,
दिलकश अब्र तू,
तू जो हासिल है,
रब भी कामिल है,
सब का सब्र तू।

गुमसुम महफ़िल को,
प्यासे साहिल को,
दिलकश अब्र तू,
तू जो हासिल है,
रब भी कामिल है,
सब का सब्र तू।

ये तेरे शिकवे, वादे, नाले
हैं बेशक मय के महके प्याले,
जो छलके तो संभल के ख्वाहिशों के
गुल खिलाएँ।


-विश्व दीपक

Friday, February 12, 2010

इन लबों के इर्द-गिर्द


मैं तुम्हारे इन लबों के इर्द-गिर्द
एक तिल भर आशियाना चाहता हूँ..

देखने को सुर्खियाँ गीले लबों की
उम्र भर का ये ठिकाना चाहता हूँ...

जब सजे इनपे तबस्सुम की लड़ी
गिरते मनकों को उठाना चाहता हूँ..

ना लगे इनकी शुआओं को नज़र,
पास में काजल चढाना चाहता हूँ...

लफ़्ज़ बरसें जो लरजते बादलों से
छानकर गज़लें बनाना चाहता हूँ...

काट ले तू झेंपकर जब भी इन्हें,
थोड़ा-सा गुस्सा चबाना चाहता हूँ...

या कि खींचे इनको तू अंगुलियों से,
मैं तभी नखरे दिखाना चाहता हूँ...

सच कहूँ तो इन लबों के हुस्न में
चार चाँद मैं लगाना चाहता हूँ...


-विश्व दीपक

Monday, February 08, 2010

मैं अब भी


मैं अब भी उसे बुरा नहीं कहता...

वो जो
आँखों के सामने रहके तड़पाती है,
बारहा आँखों के पीछे भी उतर आती है
ख्वाबों के झरोखे से
और उड़ा जाती है नींद.......
मैं नींद में भी उससे कुछ कह नहीं पाता...
बस सुनता रहता हूँ उसकी जबां..
जो
चुटखी भर हिन्दी,
नाखून भर पंजाबी
और हथेली भर अंग्रेजी
का पुट लिए रहती है....
क्या कुछ कह जाती है वो...
मुझे उसकी बातें सुनाई नहीं पड़ती,
हाँ
इतना होता है कि
उसके लबों की जुंबिश,
लबों की लरजिश
जम जाती है सीने में .....
और मेरी धड़कन
मेरा साथ छोड़ने लगती है...
ठीक वैसे हीं
जैसे
उसे देखते वक्त होता है........

मैं तब भी कोई शिकायत नहीं करता..
मैं तब भी उसे बुरा नहीं कहता..


-विश्व दीपक