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Friday, February 12, 2010
इन लबों के इर्द-गिर्द
मैं तुम्हारे इन लबों के इर्द-गिर्द
एक तिल भर आशियाना चाहता हूँ..
देखने को सुर्खियाँ गीले लबों की
उम्र भर का ये ठिकाना चाहता हूँ...
जब सजे इनपे तबस्सुम की लड़ी
गिरते मनकों को उठाना चाहता हूँ..
ना लगे इनकी शुआओं को नज़र,
पास में काजल चढाना चाहता हूँ...
लफ़्ज़ बरसें जो लरजते बादलों से
छानकर गज़लें बनाना चाहता हूँ...
काट ले तू झेंपकर जब भी इन्हें,
थोड़ा-सा गुस्सा चबाना चाहता हूँ...
या कि खींचे इनको तू अंगुलियों से,
मैं तभी नखरे दिखाना चाहता हूँ...
सच कहूँ तो इन लबों के हुस्न में
चार चाँद मैं लगाना चाहता हूँ...
-विश्व दीपक
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