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Wednesday, December 05, 2012

उस तरह का प्यार


मैं तकरीबन हर उस किसी को प्यारा हूँ
जो मुझे "उस तरह" प्यार नहीं करती..

और जो करती थी बातें मुझे "उस तरह" प्यार करने की,
उसे इस तरह प्यारा हुआ मैं
कि आजकल
मुझसे नहीं करती बात तक;
शायद डरती है
कि कहीं कोई ठेस न लग जाए मुझे...

वह नहीं करती है बात
और यही बात मुझे चुभती है सबसे ज्यादा..

वे करती हैं बातें
जिन्हें मैं बहुत प्यारा हूँ,
लेकिन उनकी बातें मुझे न प्यार देती हैं और न हीं कोई ठेस..

अब सोचता हूँ
कि "प्यारा मानने" और "उस तरह प्यार करने" के बीच
क्यों है यह पुल
जो बदल देता है परिभाषा प्यार और ठेस की?

मैं पेंडुलम की तरह टहलते हुए इस पुल पर
कोसता हूँ उन्हें
जो या तो इस तरफ हैं या उस तरफ
और जो ज़मीन बाँट कर बैठी हुई हैं सौतनों की तरह...

मै ,
जिसे "प्यारा" कहने वाली "उस तरह" का प्यार नहीं करती,
फेरता हूँ निगाहें दोनों तरफों से
और कूद पड़ता हूँ
पुल के नीचे बहती
.
.
नफरत की नदी में...

इस नदी में
यकीन मानिए...... बेहद सुकून है....

- Vishwa Deepak Lyricist

Wednesday, June 20, 2012

फिसलन


अब कि
तुम्हारे फिसलनदार कोटरों में
वह माद्दा नहीं कि
मेरी परछाई तक तो थाम सकें...

ये तुम्हारी दो "गज़ाल-सी आँखें"
नदी भर-भर रोती रहें

या डूब मरें उन्हीं में,
मैं किनारे के पत्थर-सा
बैठा रहूँगा वहीं,
भले तुम भिंगोती रहो मुझे,
लेकिन मैं न राह दूँगा... न हीं हाथ...
हाँ, इतनी मेहरबानी करूँगा
कि
जब तुम सर या पैर दे मारो मुझपे,
तो मैं
सहेज के रख लूँ खून के कुछ कतरे
जो यकीनन हैं मेरे हीं...

याद है? -
मेरी उस दुनिया
की चूने वाली दो दीवारों पर
कत्थई रंग से तुमने लिखा था
मेरा नाम कभी
और मैं हर बार अपने नाम के रस्ते
तुम्हारे नाम, तुम्हारी पहचान में उतर आता था
और इस तरह मुकम्मल हो जाता था मैं,
मुझे लगता था
कि दो पहचानों ने एक पहचान को जना है...

तुमने न जाने कब
उन दीवारों में खिड़कियाँ ठूंस डालीं,
न जाने कितनी बार
खुल चुकीं है वे खिड़कियाँ अब तक..
आह!
कत्थई को कालिख कर दिया तुमने!!!

अब
तुम्हारी इन फिसलनदार कोटरों में
वही ठहर सकता है
जो नाखून टिका दे इनकी ज़मीं पे
या छील आए इन्हें
जैसे कोई हटाता है
काई अपने आंगन से..

मैं न कर पाऊँगा ऐसा
क्योंकि इन कोटरों में
कभी रहा था मैं
अपना हक़ जानकर...

- Vishwa Deepak Lyricist