Showing posts with label heart-break. Show all posts
Showing posts with label heart-break. Show all posts

Wednesday, December 05, 2012

उस तरह का प्यार


मैं तकरीबन हर उस किसी को प्यारा हूँ
जो मुझे "उस तरह" प्यार नहीं करती..

और जो करती थी बातें मुझे "उस तरह" प्यार करने की,
उसे इस तरह प्यारा हुआ मैं
कि आजकल
मुझसे नहीं करती बात तक;
शायद डरती है
कि कहीं कोई ठेस न लग जाए मुझे...

वह नहीं करती है बात
और यही बात मुझे चुभती है सबसे ज्यादा..

वे करती हैं बातें
जिन्हें मैं बहुत प्यारा हूँ,
लेकिन उनकी बातें मुझे न प्यार देती हैं और न हीं कोई ठेस..

अब सोचता हूँ
कि "प्यारा मानने" और "उस तरह प्यार करने" के बीच
क्यों है यह पुल
जो बदल देता है परिभाषा प्यार और ठेस की?

मैं पेंडुलम की तरह टहलते हुए इस पुल पर
कोसता हूँ उन्हें
जो या तो इस तरफ हैं या उस तरफ
और जो ज़मीन बाँट कर बैठी हुई हैं सौतनों की तरह...

मै ,
जिसे "प्यारा" कहने वाली "उस तरह" का प्यार नहीं करती,
फेरता हूँ निगाहें दोनों तरफों से
और कूद पड़ता हूँ
पुल के नीचे बहती
.
.
नफरत की नदी में...

इस नदी में
यकीन मानिए...... बेहद सुकून है....

- Vishwa Deepak Lyricist

Sunday, October 28, 2012

पत्थर पे माथा धर देना


गर इश्क़ मुझे हो जावे तो..

टुकड़े-टुकड़े दिल कर देना,
पत्थर पे माथा धर देना,
किस्मत में कालिख भर देना..

पर भूल के भी
सुन लो मेरे
प्रश्नों का न कुछ उत्तर देना,
न सपनों को हीं पर देना..
न जुनूं को मेरे घर देना...

बस
चिथड़े-चिथड़े दिल कर देना..

गर इश्क़ मुझे हो जावे तो!!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Wednesday, September 19, 2012

गिद्ध घरों पे बैठे तो


पत्थर या नमक दे जाती है,
हर लहर जो मुझ तक आती है...

मैं रेत के साहिल जैसा हूँ...

_________________


वह उड़ते-उड़ते बैठ गया मेरी आँखों में,
तब से हीं मेरी आँखों में कोई ख्वाब नहीं...

गिद्ध घरों पे बैठे तो मौत का आलम होता है..

________________


इश्क़ की बेरूखियों को रखता आया पन्नों पे,
सर पटक के आज हर्फ़ों ने किया है आत्मदाह..

मैं जलूँ या तुझको सीने से निकालूँ, तू हीं कह..

________________


सुबह से तुम्हारी यादों की हो रही हैं उल्टियाँ,
एक "हिचकी" की दवा दे जाओ कि चैन आए..

याद कर-करके मुझे मार हीं दो तो बेहतर हो..

_________________


तुम सुधर गए हमें बिगाड़ते-बिगाड़ते,
हम उधड़ गए तुम्हें संवारते-संवारते..

प्यार तो था हीं नहीं, बस नीयतों की जंग थी...

- Vishwa Deepak Lyricist

Saturday, January 21, 2012

उग-सा आया

जभी चाहा तभी मैं उग-सा आया,
हटा के पत्थरों को उठ-सा आया,
तुम्हारे नाखूनों के उन्स भर से
ज़मीं की गैरियत को उकसा आया।

बहुत सब्जा,
बहुत सब्जा,
बहुत समझा कि अब सब्जा
की है बारी इस सहरे में
बहुत समझा कि सपनों की
है तैयारी दुपहरे में,
बहुत समझा कि माटी पे
लकीरें हैं लगावट की,
नहीं समझा कि मैं बस हूँ
कतारों में सजावट की..

जभी चाहा
जभी चाहा मुझे वो चुग-सा आया..


तुम्हारे नाखूनों के उन्स भर से
ज़मीं की गैरियत को उकसा आया।

बहुत उबला,
बहुत उबला,
बहुत उजला-सा ये उबला
जो है आँसू किनारों में
बहुत उगला है आँखों ने
नमक-सा हर गरारों में,
बहुत उजड़ा हूँ मैं तो अब
जड़ों में इस मिलावट से,
नहीं उबरा हूँ नस-नस में
ज़हर वाली लिखावट से..

जभी चाहा
जभी चाहा लबों पे टुक-सा आया..


तुम्हारे नाखूनों के उन्स भर से
ज़मीं की गैरियत को उकसा आया।