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Friday, July 19, 2013

मैं सरल हूँ


मैं तरल हूँ!

मुझे टुकड़ों में बाँटो
और पी जाओ..

मैं चुभूंगा नहीं..

बस खुली रखना
अपनी सिकुड़ी नलिकाएँ..

उतरूँगा शाखाओं में
मैं
और तुम्हें
कर दूँगा ठोस..

मैं सरल हूँ!!

मुझे प्रिय हैं
खंडहरों की नींवें
और तुम्हारा चढता-उतरता व्यक्तित्व...

- Vishwa Deepak Lyricist

Saturday, January 21, 2012

उग-सा आया

जभी चाहा तभी मैं उग-सा आया,
हटा के पत्थरों को उठ-सा आया,
तुम्हारे नाखूनों के उन्स भर से
ज़मीं की गैरियत को उकसा आया।

बहुत सब्जा,
बहुत सब्जा,
बहुत समझा कि अब सब्जा
की है बारी इस सहरे में
बहुत समझा कि सपनों की
है तैयारी दुपहरे में,
बहुत समझा कि माटी पे
लकीरें हैं लगावट की,
नहीं समझा कि मैं बस हूँ
कतारों में सजावट की..

जभी चाहा
जभी चाहा मुझे वो चुग-सा आया..


तुम्हारे नाखूनों के उन्स भर से
ज़मीं की गैरियत को उकसा आया।

बहुत उबला,
बहुत उबला,
बहुत उजला-सा ये उबला
जो है आँसू किनारों में
बहुत उगला है आँखों ने
नमक-सा हर गरारों में,
बहुत उजड़ा हूँ मैं तो अब
जड़ों में इस मिलावट से,
नहीं उबरा हूँ नस-नस में
ज़हर वाली लिखावट से..

जभी चाहा
जभी चाहा लबों पे टुक-सा आया..


तुम्हारे नाखूनों के उन्स भर से
ज़मीं की गैरियत को उकसा आया।