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Sunday, October 28, 2012

पत्थर पे माथा धर देना


गर इश्क़ मुझे हो जावे तो..

टुकड़े-टुकड़े दिल कर देना,
पत्थर पे माथा धर देना,
किस्मत में कालिख भर देना..

पर भूल के भी
सुन लो मेरे
प्रश्नों का न कुछ उत्तर देना,
न सपनों को हीं पर देना..
न जुनूं को मेरे घर देना...

बस
चिथड़े-चिथड़े दिल कर देना..

गर इश्क़ मुझे हो जावे तो!!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Saturday, September 22, 2012

ख़ुदा ने इश्क़ लिख भेजा था उनमें


आज तोड़ डालो मुझे परत-दर-परत
कि मैं बामियान के बुद्ध-सा निर्लज्ज खड़ा हूँ..

होते में हूँ तुम्हारे, अहाते में हूँ तुम्हारे..

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इस बार मैं जो आऊँ तो मकसद न पूछना,
बस घर को घूर लेना, मैं लौट जाऊँ जब..

दो-चार गर्द होंगे कम, दो-चार रंग जियादा

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बस करवटों में रात चली जाएगी शायद,
मैं साहिलों पे डूबता-उठता हीं रहूँगा?

इन सलवटों में एक किनारा तो हो तेरा...

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लिफाफे जिस्म के खोले बहुत पर,
कहीं भी रुह की चिट्ठी पढी तूने नहीं...

खुदा ने "इश्क़" लिख भेजा था उनमें...

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न मैं "मेहमान" हो पाया उस घर का,
न तुम हीं "परिवार" हो पाई मेरी..

दोनों घर अजनबी हो गए..बस...

- Vishwa Deepak Lyricist

Wednesday, September 19, 2012

गिद्ध घरों पे बैठे तो


पत्थर या नमक दे जाती है,
हर लहर जो मुझ तक आती है...

मैं रेत के साहिल जैसा हूँ...

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वह उड़ते-उड़ते बैठ गया मेरी आँखों में,
तब से हीं मेरी आँखों में कोई ख्वाब नहीं...

गिद्ध घरों पे बैठे तो मौत का आलम होता है..

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इश्क़ की बेरूखियों को रखता आया पन्नों पे,
सर पटक के आज हर्फ़ों ने किया है आत्मदाह..

मैं जलूँ या तुझको सीने से निकालूँ, तू हीं कह..

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सुबह से तुम्हारी यादों की हो रही हैं उल्टियाँ,
एक "हिचकी" की दवा दे जाओ कि चैन आए..

याद कर-करके मुझे मार हीं दो तो बेहतर हो..

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तुम सुधर गए हमें बिगाड़ते-बिगाड़ते,
हम उधड़ गए तुम्हें संवारते-संवारते..

प्यार तो था हीं नहीं, बस नीयतों की जंग थी...

- Vishwa Deepak Lyricist

Saturday, December 10, 2011

बस असर मैं कातिलाना चाहता हूँ

इश्क़ मैं कुछ यूँ जताना चाहता हूँ, 
मौत के घर आशियाना चाहता हूँ.. 


कब मिली है, कब मिलेगी ज़िंदगी, 
जानकर भी आजमाना चाहता हूँ.. 


कारगर है तेरी अंखियों का हुनर, 
पर असर मैं कातिलाना चाहता हूँ.. 


प्यार में जन्नत मिले- ऐसा नहीं, 
बस ज़रा-सा आबो-दाना चाहता हूँ 


मैं ’मुकम्मल’ हूँ कि हूँ ’तन्हा’ बता, 
आज ये उलझन मिटाना चाहता हूँ... 


- विश्व दीपक