मैं एक दिन लिखूँगा खुद को
तुम उस दिन भी नकार देना
मेरे लिखे को
आदतन..
और मैं
निकल जाऊँगा
तुम्हारी अपेक्षाओं से परे
बिल्कुल अपनी कविताओं की तरह
हँसते हुए........ तुमपे!!!
- Vishwa Deepak Lyricist
नाटे कद की ज़िंदगी
फैलती है जा रही..
आसमां से बोल दो
नए रिश्ते ना बाँधा करे,
हाथ की ऊँचाई अब
है देह को छका रही..
नाटे कद की ज़िंदगी..
शाम की ढलान पे
हैं सुर्ख लब सिमट रहे,
ओक भर की आँख में
है रात छलछला रही..
नाटे कद की ज़िंदगी..
वो वहीं से बिन कहे
लौट गए आज भी,
हमने "प्यार" सुन लिया,
अब साँस बड़बड़ा रही..
नाटे कद की ज़िंदगी,
फैलती है जा रही...
- Vishwa Deepak Lyricist