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Thursday, March 14, 2013

एक छटांक सूरज


मुँह अंधेरे
आँखों का आबनूसी रंग
उड़ेल दिया
मेरी उतरती पलकों पर..

शर्म से गुलाबी हो गए गाल
और लब सुर्ख..

तुमने डिंपलों में डुबोई
अपनी उंगलियाँ
और एक छटांक सूरज निकालकर
भर दी मेरी मांग..

एक बार फिर
फैल गया फागुन
चारों ओर..

काश!
हर दिन की होली यूँ हीं बनी रहे...

आमीन!!!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Tuesday, January 22, 2013

ज़ेरोक्स करके रख लूँ मैं


आपकी बदमाशियाँ ज़ेरोक्स करके रख लूँ मैं..

आईये
कुछ बोलिये,
आँखों को मेरी खोलिये,
मुझको खिलौना कीजिए,
हाथों से टोना कीजिए..

पलकों पे साँसें मारिये,
कानों में झांसे मारिये,
मैं टोकूँ तो हँस दीजिए,
जो बोलूँ कि बस कीजिए
तो रूठ के चल दीजिए..

फिर लौट के खुद आईये
और आते हीं भिड़ जाईये...

आईये
आ जाईये,
आपकी बदमाशियाँ ज़ेरोक्स कर के रख लूँ मैं..

ख्वाब में आती है जो
आपकी हमनाम एक
आप-सी दिखती तो है
पर हैं हुनर उन्नीस हीं..

बीस तो बस आप हैं..

ख्वाब के उस ’आप’ को
आप करने के लिए
आईये
आ जाईये,
आपकी बदमाशियाँ ज़ेरोक्स कर के रख लूँ मैं..

देखिए,
साँस की खुराक का सवाल है!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Saturday, October 20, 2012

प्यार की मीठी चाय


तब रोया था वो...

पाँव लफ़्ज़ के उलझ पड़े थे,
छिटक के साँसें - सांय - गिरी थीं,
आँखों के फिर आस्तीन पर
प्यार की मीठी चाय गिरी थी,
बर्फ ख्वाब के पिघल गए तब,
पलक से बूँदें हाय, गिरी थीं..

हाँ, रोया था वो...

- Vishwa Deepak Lyricist

Friday, October 12, 2012

हारता रहा अपनी नींदें


रात भर तुम्हें सोचता रहा..
रात भर तुम्हारी बादामी आँखें बढाती रहीं मेरी याददाश्त..
रात भर बुनता रहा तुम्हारी पलकों से एक कंबल, एक बिस्तर..
रात भर लेता रहा करवटें तुम्हारे चेहरे के चारों ओर..

रात भर उधेड़ता रहा दो साँसों के बीच के धागे को..

रात भर बस जीता रहा तुम्हें... और हारता रहा अपनी नींदें...

रात भर कातता रहा मैं एक रात,
तुम्हारे ख्वाब में!!

- Vishwa Deepak Lyricist