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Tuesday, January 22, 2013

ज़ेरोक्स करके रख लूँ मैं


आपकी बदमाशियाँ ज़ेरोक्स करके रख लूँ मैं..

आईये
कुछ बोलिये,
आँखों को मेरी खोलिये,
मुझको खिलौना कीजिए,
हाथों से टोना कीजिए..

पलकों पे साँसें मारिये,
कानों में झांसे मारिये,
मैं टोकूँ तो हँस दीजिए,
जो बोलूँ कि बस कीजिए
तो रूठ के चल दीजिए..

फिर लौट के खुद आईये
और आते हीं भिड़ जाईये...

आईये
आ जाईये,
आपकी बदमाशियाँ ज़ेरोक्स कर के रख लूँ मैं..

ख्वाब में आती है जो
आपकी हमनाम एक
आप-सी दिखती तो है
पर हैं हुनर उन्नीस हीं..

बीस तो बस आप हैं..

ख्वाब के उस ’आप’ को
आप करने के लिए
आईये
आ जाईये,
आपकी बदमाशियाँ ज़ेरोक्स कर के रख लूँ मैं..

देखिए,
साँस की खुराक का सवाल है!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Wednesday, October 31, 2012

पत्थर पे इक पत्थर पड़ा


थोड़ा बुझा, थोड़ा उड़ा,
आँखों में जो सपना गिरा,
पत्थर पे इक पत्थर पड़ा,
झरने चले, लावा उड़ा..

अच्छा हुआ, जैसा हुआ,
कसमें खुलीं, किस्सा खुला,
रस्में खुलीं, रस्ता खुला,
सहरा तले दरिया खुला..

- Vishwa Deepak Lyricist