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Saturday, September 08, 2012

मैं जम्हूरियत का बागी हूँ


ना चमड़ी है जो खून जने,
ना दमड़ी हीं जो सिंदुर दे..

ले भटकोइयां और मांग सजा...

*भटकोइयां = खर-पतवार श्रेणी का एक पौधा जिसपे "मटर-दाने" की तरह के फूल उगते है और जिन्हें फोड़ने पर लाल रंग निकलता है

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वो काटता है जब माटी को,
माटी-सा कटता जाता है...

सोना सोता है संसद में..

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गदगद हैं पूँछ उगाकर सब,
जो कल तक मुझ-से इंसां थे..

मैं जम्हूरियत का बागी हूँ...

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तालीम जहां की ऐसी है,
हर शख्स करैला नीम-चढा..

चुप्पी भी ज़हर उगलती है..

- Vishwa Deepak Lyricist

Monday, June 18, 2012

अथाह शून्य


मेरे तमाम शब्द काल-कवलित हो गए हैं...

मैं अब लम्हों की लाठी लिए चल रहा हूँ बस,
कोई कागज़ की ज़मीन दे तो मैं उन लम्हों को गाड़ आऊँ
और कोल्हू के बैल की तरह बाँध आऊँ अपनी लेखनी को उस खूँटे से..

सालों तक घिसकर कम से कम एक शब्द तो बह निकलेगा -
या तो खून से या पसीने से लथपथ!!!

शब्दों के बिना मैं अपाहिज़
"अथाह शून्य" में लोटपोट कर रहा हूँ
सदियों से....

- Vishwa Deepak Lyricist