हम चेहरे चुनते हैं,
हम चेहरे सुनते हैं,
चेहरे की लीपापोती को
चेहरे-सा गुनते हैं...
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चेहरे पर सारी नीयत
आकर रुक जाती है,
चेहरे पर सच्ची सीरत
रुककर झुक जाती है...
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चेहरा औरों की खातिर
मस्तिष्क हो जाता है,
चेहरा हर थोथे निर्णय का
मालिक हो जाता है...
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चेहरा चेहरा न होकर
इंसान-सा जीता है,
चेहरा इस ओछी दुनिया में
भगवान सरीखा है....
- Vishwa Deepak Lyricist
मुखौटा ओढकर हँसता रहता हूँ दिन भर..
रात को मुखौटा उतारता हूँ तो
छिली होती है झुर्रियाँ...
उम्र आँसू की आदी हो गई है शायद...
अब सुबह तक रोऊँगा तभी चेहरे का फर्श पक्का होगा,
जान आएगी सीमेंट में...
इतना तो अनुभव है;
मैं अनुभव से बोलता हूँ!!!!!
- Vishwa Deepak Lyricist
जो कमबख्त पत्थर थे कल तक मेरे घर,
वो फूलों में तब्दील होने लगे हैं..
इलाही ये क्या माज़रा है बता दो,
बियाबां जो सब झील होने लगे हैं...
हूँ ज़िंदा या मुर्दा कि वो सारे सादिक़
मुखौटों को यूँ छील, होने लगे हैं..
सादिक़ = pure, honest, true
- Vishwa Deepak Lyricist