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Monday, February 18, 2013

मुर्दानगी


मैं शांत हूँ..

मेरी भूख डाल दो
कुत्ते की अंतड़ियों में..

वह कम-से-कम झपटेगा तो..

मैं शांत हूँ..

मुझे शांत रहना विरासत में मिला है!!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Monday, August 27, 2012

हूँ ज़िंदा या मुर्दा


जो कमबख्त पत्थर थे कल तक मेरे घर,
वो फूलों में तब्दील होने लगे हैं..

इलाही ये क्या माज़रा है बता दो,
बियाबां जो सब झील होने लगे हैं...

हूँ ज़िंदा या मुर्दा कि वो सारे सादिक़
मुखौटों को यूँ छील, होने लगे हैं..

सादिक़ = pure, honest, true

- Vishwa Deepak Lyricist

Sunday, July 29, 2012

भानुमति का पिटारा


परिवर्तन
एक पिंजड़े की तरह है
जिसमें कैद है भविष्य का कोई तोता,
वह तोता जो रंग बदलता है
अपने इर्द-गिर्द की हवा के हिसाब से,
वह तोता
जिसकी तन्दुरूस्ती का पलड़ा
उसके जायके से भारी है
और उसके हाव-भाव
इसपर निर्भर करते हैं कि उसे
चना मिला है या मिला है
आखिरी रोटी का आखिरी निवाला...

यूँ कहें तो
परिवर्तन की खुशहाली या तंगहाली
उसके रहनुमाओं, उसके रखवालों
के हाथों में है..

लेकिन हमें
उस तोते का इतना ख्याल होता है
कि हम
हर पल डरते होते हैं
एक अनदिखे, अनसुने बाज से..
इसलिए हम
निकाल कर उन खिड़कियों की सलाखें,
वहाँ चुनवा देते हैं दीवारें
ताकि
उस तोते के तोते न उड़ जाएँ...

फिर तो बस
साँस हीं लेता रह जाता है वह तोता
या शायद... उतना भी नहीं,
हम इस तरह भूल जाते हैं तोते को
और नज़र रखते हैं बस पिंजड़े पर...

अब यह पिंजड़ा
तब्दील हो चुका होता है
भानुमति के पिटारे में...

इस पिटारे से फिर
कब, क्या, कैसा तोता निकले,
ज़िंदा या मुर्दा
किसे पता...

ऐसे में
भविष्य बन जाता है बोझ
परिवर्तन के लिए
और परिवर्तन हमारे लिए...

चलो आओ
इस पिंजड़े की खिड़कियाँ खोलें
और दें
भविष्य के तोते को
ज़िंदादिली के जामुन,
फिर देखो कैसे उचककर
परवाज़ भरता है यह तोता
परिवर्तन के पिंजड़े के साथ...

फिर देखो....काहे का बोझ...

- Vishwa Deepak Lyricist

Tuesday, July 03, 2012

तन्हा तो एक बला है


पत्थर है कि ख़ुदा है,
इंसान जाने क्या है!

टूटेंगीं मूरतें अब,
मंदिर का सर झुका है..

शब्दों की धांधली है,
मुर्दा भी जी चला है..

छूटोगे मुझसे कैसे,
"तन्हा" तो एक बला है...

- Vishwa Deepak Lyricist