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Monday, February 18, 2013

क्या मैं बजाया जा रहा हूँ?


फटती है बिवाई
तो मैं
निकल पड़ता हूँ चप्प्ल सिलवाने...

फसलों को मार जाता है पाला
तो मैं
हथेली पर रोपने लगता हूँ
नई उम्र के नए बिरवे..

चलती सड़क
गुलाटी मार
जब झपट पड़ती है मुझपे
तो मैं हाथ-पाँव झाड़
निपोड़ देता हूँ अपनी बत्तीसी
और
पकड़कर पगडंडियों की पूँछ
करने लगता हूँ चीटियों से कदम-ताल...

चीखती रातें
मुझे लगती हैं
बेताल-दर्शन का
स्पेशल टूर पैकेज...

मैं मुंडवा लेता हूँ सर
जब उलझने लगती हैं
मेरे बालों में सवाना घास,
फिर बेच डालता हूँ
अपने घर के सारे ढोलक, तबले, मृदंग...

मैं निकालता हूँ रोज़ नई धुन
अपनी झुकी पसलियों से
और वे कहते हैं कि
मैं बजाया जा रहा हूँ..

क्या मैं बजाया जा रहा हूँ?

मुझे नहीं लगता
लेकिन
वे दु:खी हैं कि मुझे दु:ख का दु:ख नहीं...

वे डाँट रहे हैं मुझे
और अब मैं सीख रहा हूँ
उनसे नए शब्द
अपनी कविताओं के लिए...

कल फिर से लिखूँगा -

"मेरे शिक्षकों.... शुक्रिया!!!"...

- Vishwa Deepak Lyricist