Showing posts with label introspection. Show all posts
Showing posts with label introspection. Show all posts

Saturday, July 20, 2013

मर नहीं तो जाओगे?


मेरे पन्ने मुझसे पूछते हैं,
ज़िंदगी रूक गई है या सोच की ज़मीन हीं
हो चली है बंजर अब..

गर नहीं है ऐसा तो
किस लिए शब्दों के दो
पाँव गुम हैं राह से..

मौन है क्यूँ लेखनी
या कि लकवा-ग्रस्त है
जो टूटती है आह से..

बोलते हैं पन्ने कि
चीरकर अहसास को लिख पड़ो कुछ भी इधर
या कि लोहू घोल दो अपनी हीं पहचान में
भोंककर खंजर अब..

सोंच की ज़मीन हीं जो हो चुकी है बंजर अब
तो छोड़ दो शायरी..

मर नहीं तो जाओगे?

मर नहीं हीं जाओगे!!

बोलते हैं पन्ने कि -
रतजगों में ऐसे भी
सोच के मर जाने से बेहतर है मरना हुनर का...

मर जाएगा ज्योहिं हुनर,
तुम जीकर क्या करोगे फिर?

मेरे पन्ने मुझसे बोलते हैं....

- Vishwa Deepak Lyricist

Tuesday, December 04, 2012

वह ज्यादातर चुप रहता है


उसने अपनी सारी आदतें उतार दीं हैं मेरे कारण...

अब वह बिगड़ने से पहले देख लेता है मेरा "मूड"..

हँसता ज्यादा है आजकल,
ज्यादातर खुद पर...

अकेले में बाँटना चाहता है ग़म मुझ से
और रख देता है दिल खोलकर..

वह अब मेरी "कड़वी" बातें भी सुन लेता है
और झुका लेता है सर...

वह झुका लेता है सर
और चिढ जाता हूँ मैं..

चिढता था मैं पहले भी,
जब वह ऐसा कतई न था..

वह बदल गया है
लेकिन मैं नहीं बदला...

वह जो मेरा "पिता" है,
मुझे आज भी लाजवाब कर जाता है!!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Saturday, December 10, 2011

तन्हा किया

एक मर्तबा.... 


एक मर्तबा, 
बस एक दफ़ा, 
खुद को जभी तन्हा किया, 
खुद को जभी "तन्हा" कहा, 
तन्हाई मुझसे आ जुड़ी बातें बनाते खामखा... 


एक दफ़ा... 


एक दफ़ा एक शर्त थी - 
तुम गर्त लो या श्रृंग लो, 
भर लो लहू से लेखनी 
या फूलों से नर-भृंग लो, 
उस घड़ी फूलों को छूकर 
देखकर खुशबू औ’ रोगन, 
भींच ली मुट्ठी जो मैंने, 
लुट गया तितली का यौवन, 
तब से काहे पास आए कोई खिलता काफ़िला... 
तन्हाई मुझसे आ जुड़ी बातें बनाते खामखा... 


"तन्हा" कहा... 


"तन्हा" कहा, तन्हा रहा, 
जाने कहाँ किसका रहा, 
खुल के मिला सबसे मगर, 
खुद से बड़ा छुपता रहा.. 
वैसे तो मेरी लेखनी में 
रस था फूलों का भरा, 
पर वो भी था तो खून हीं 
फिर जमता कैसे मामला, 
आखिर पड़ा शब्दों से जो गाहे-ब-गाहे वास्ता, 
तन्हाई मुझसे आ जुड़ी बातें बनाते खामखा.. 


खुद को जभी तन्हा किया, 
खुद को जभी "तन्हा" कहा... 
एक मर्तबा...


-विश्व दीपक