मेरे पन्ने मुझसे पूछते हैं,
ज़िंदगी रूक गई है या सोच की ज़मीन हीं
हो चली है बंजर अब..
गर नहीं है ऐसा तो
किस लिए शब्दों के दो
पाँव गुम हैं राह से..
मौन है क्यूँ लेखनी
या कि लकवा-ग्रस्त है
जो टूटती है आह से..
बोलते हैं पन्ने कि
चीरकर अहसास को लिख पड़ो कुछ भी इधर
या कि लोहू घोल दो अपनी हीं पहचान में
भोंककर खंजर अब..
सोंच की ज़मीन हीं जो हो चुकी है बंजर अब
तो छोड़ दो शायरी..
मर नहीं तो जाओगे?
मर नहीं हीं जाओगे!!
बोलते हैं पन्ने कि -
रतजगों में ऐसे भी
सोच के मर जाने से बेहतर है मरना हुनर का...
मर जाएगा ज्योहिं हुनर,
तुम जीकर क्या करोगे फिर?
मेरे पन्ने मुझसे बोलते हैं....
- Vishwa Deepak Lyricist
तुम लिख लेते हो..
रात भर या तो तिलचट्टे
के बादामी बदन,
छह टांगों
और कागज़ी पंखों
में ढूँढते रहते हो
बदरंग और
बजबजाती किस्मत के रहस्य,
जो भागते रहते हैं तुमसे
बिलबिलाकर..
या फिर किसी तिलमिलाते
"तिल" की
तरेरती आँखों में
गोंद डालकर
चिपकाते रहते हो
अपना प्रणय-निवेदन
और हार जाने पर
उन्हीं आँखों के मटियल पानी में
चप्पु थमाकर
उतारते रहते हो
अपनी कुंठा
ताकि
जितनी आगे बढे
तुम्हारी छिछली सोच,
उतनी हीं छिलती जाए
"उन" आँखों की अना..
अफ़सोस!
तुम न तो
कर पाते हो
अपनी किस्मत पे काबू,
न हीं उड़ेल पाते हो
"उन" आँखों में अमावस..
फिर भी,
करते हुए
तिल का ताड़,
तुम
लिखते रहते हो..
तुम लिख लेते हो!!
- Vishwa Deepak Lyricist