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Monday, December 17, 2018

बेटियाँ


बेटियाँ माँ होती हैं|

रूठती हैं, मनाती हैं ,
सराहती हैं, सुनाती हैं,
खीझती हैं, खींचती हैं,
रेशा-रेशा सींचती हैं|

बेटियाँ होती हैं जड़
पिता के तलवों की,
बीज़
हथेली की लकीरों की,
आवाज़
मूक जिजीविषा की,
ख्वाब
हर बुनी-अनबुनी नींद की|

बेटियाँ
जब हक़ जताती हैं
तो
भरी होती हैं आत्मविश्वास से,
हर क्रिया, प्रतिक्रिया पर
होता है एकाधिकार उनका|
पिता फिर
अपने अंश का अंश बन
सौंप देता है अपनी हर महानता,
हर विशालता
बेटी के बचपने की गोद में|
.
और
फूल जाता है आसमान तक...

- Vishwa Deepak Lyricist

Tuesday, December 04, 2012

वह ज्यादातर चुप रहता है


उसने अपनी सारी आदतें उतार दीं हैं मेरे कारण...

अब वह बिगड़ने से पहले देख लेता है मेरा "मूड"..

हँसता ज्यादा है आजकल,
ज्यादातर खुद पर...

अकेले में बाँटना चाहता है ग़म मुझ से
और रख देता है दिल खोलकर..

वह अब मेरी "कड़वी" बातें भी सुन लेता है
और झुका लेता है सर...

वह झुका लेता है सर
और चिढ जाता हूँ मैं..

चिढता था मैं पहले भी,
जब वह ऐसा कतई न था..

वह बदल गया है
लेकिन मैं नहीं बदला...

वह जो मेरा "पिता" है,
मुझे आज भी लाजवाब कर जाता है!!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Sunday, June 17, 2012

एक सवाल

गुस्ताख निगाहों से तकता है वह तुम्हें
और तुम
अपनी नाकामयाबी का सारा ठीकरा
फोड़ देते हो उसके सर..

उसकी कालिंदी में डूबते-उबरते हो हर लम्हा
लेकिन
कतराते हो उसके किनारों कि छुअन तक से,
भूल जाते हो कि
उसी कालिंदी-कूल-कदंब की डालियों पे तुमने
मर्म जाना था कभी
कदम फूंक-फूंक रखने का..

वह उम्र भर के तमाम झंझावातों को
जज़्ब करता रहा है अब तलक,
ऐसे में कभी जो
फाड़ कर दिल की ज़मीं
निकल आई है झुंझलाहट
तो वह
मनमानी नहीं,
मजबूरी है एक-
खामियाज़ा है महज
किसी शिशुपाल की सौवीं भूल का..

वह जो बलराम-सा हल लिए
जोतता रहता है तुम्हारे खेत,
खेत तुम्हारी ज़िंदगी का,
खेत तुम्हारे मुस्तकबिल का;
उसकी ज़िंदगी की शाम में
तुम उसे आध दिहाड़ी तक नहीं देते -
वह कोई बंधुआ मजदुर तो नहीं,
पिता है तुम्हारा...

पिता है मेरा,
पिता है मेरा!!! 



- Vishwa Deepak Lyricist