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Tuesday, November 03, 2020

सुकृति

मैं तुझमें अपना होना देखूं, तेरी गोद में रोज़ बिछौना देखूं। . तेरी हँसी में देखूं चित्रहार, मेरे जीवन का सारा विस्तार, तेरे नाम से जोड़ के नाम मेरा, मैं रख दूं तुझमें अपना संसार। . संसार की सारी समस्याओं का खोना, जादू-टोना देखूं। तेरी गोद में रोज़ बिछौना देखूं। . मैं बेमकसद बहती एक नदी, न अर्थ, न लक्ष्य, न पाबंदी, एक दिन सब बदला एक क्षण में जब प्राप्त हुई मुझे 'सुकृति'। . उस क्षण से सदी की करवट का करतब मैं कोना-कोना देखूं। तेरी गोद में रोज़ बिछौना देखूं।

Thursday, December 21, 2017

तुम हँसना


जब घाम गिरे
या बचकानी दुनिया के फिकरे
दो कौड़ी के दाम गिरें,
तुम हँसना!

एक माया है,
दिन-रात नज़र का साया है,
उनकी कथनी से क्या हासिल,
खुद में रखना खुद को शामिल,
बढते जाना,
गढते जाना,
हर नींद ख़्वाब चढते जाना,
फिर चाहे अनथक पैरों पर
धरती के जो इल्ज़ाम गिरें,
तुम हँसना!

हमने तुममें साँसें फूँकी?
ना!
तुमने हममें साँसें फूँकी,
तुमने हममें आसें फूँकी,
खुशियों में जीवन आ उतरा,
घर में एक आँगन आ उतरा,
हम ऋणी तुम्हारे हैं बेटी,
तुम खुद हमसे उऋण रहना,
और चाहे जितनी भी शर्त्तें
तुमपर अपनों के नाम गिरें,
तुम हँसना!

- Vishwa Deepak Lyricist

Wednesday, March 04, 2015

हमारा शुद्ध-रूप है वह


तुम सीपी हो या शंख,
या हो असंख्य
मेरे अंदर..
.
तुमने जना है जिसे
वह मेरी हर ’कृति’ से विशाल है,
वह नोंक है कलम की,
सौंदर्य है सृष्टि का,
मेरे अंतस का सुर-ताल है...
.
हम दोनों का अंश?
या फिर
भविष्य की इस निधि
के अंश हैं हम?
हमारा शुद्ध-रूप है वह
और अपभ्रंश हैं हम...
.
शुक्रिया!
स्वाति, सीपी, शंख..
शुक्रिया असंख्य
इस अमृत के लिए...
.
हम दोनों अब
अणु बन
इस अमृत में पिघलेंगे...

- Vishwa Deepak Lyricist