Monday, September 24, 2012

क्या कहूँ इस कुफ़्र को?


हाँ ये ज़ाहिर है कि तू मेरा नहीं, उसका तो है,
उस खुदा का जिसने मेरा दिल है तेरा कर दिया...

क्या कहूँ इस कुफ़्र को- थोड़ी अदा, थोड़ी जफ़ा?

_________________


तुम जीते-जी जी न पाए,
मैं मरता था, सो मर न पाया....

असर अलग पर हश्र एक-से..

________________


वह वहीं होता है जहाँ मेरी भनक बसती है,
वह वहीं होता है जहाँ मेरी तलब उठती है..

तलबगार भी वही है, तलब भी तो है वही...

________________


चलो दूरियों को अपनाएँ,
चलो खामखा झगड़ा कर लें..

यही दवा है ग़म-ए-इश्क़ की..

_________________


मुद्दत हुई, मैंने तुझे देखा न उस तरह,
हरेक तरह देखा है पर, मुद्दत से तुझे हीं..

मुद्दत हुई हर इक तरह में "वह" तरह रखे...

- Vishwa Deepak Lyricist

Sunday, September 23, 2012

रिसते रिश्ते


कमाल का है पैरहन दुनिया की ज़ात का,
उधड़े कि या साबूत हो - उरियाँ हीं है रखे...

रिश्तों के जो रेशे हैं रिसते हैं हर घड़ी...

_________________


हत्थे से हीं उखड़ गई वो जड़ ये जान के
कि फूल-पत्तियों ने खुद को उससे लाज़िमी कहा...

तुम गए तो साथ मेरी मिट्टी भी तो ले गए..

________________


पत्थर या नमक दे जाती है,
हर लहर जो मुझ तक आती है...

मैं रेत के साहिल जैसा हूँ...

________________


राह में तेरी रखी होंगीं ये आँखें उम्र भर,
जब उतर आओ अनाओं से बता देना इन्हें...

सात जन्मों का समय है, कोई भी जल्दी नही...

_________________


मुझे एक टीस ने ज़िंदा रखा है,
तुम्हें एक टीस से मरना पड़ा था...

मिटा दूँ टीस तो मर जाऊँ मैं भी...

- Vishwa Deepak Lyricist

Saturday, September 22, 2012

ख़ुदा ने इश्क़ लिख भेजा था उनमें


आज तोड़ डालो मुझे परत-दर-परत
कि मैं बामियान के बुद्ध-सा निर्लज्ज खड़ा हूँ..

होते में हूँ तुम्हारे, अहाते में हूँ तुम्हारे..

_________________


इस बार मैं जो आऊँ तो मकसद न पूछना,
बस घर को घूर लेना, मैं लौट जाऊँ जब..

दो-चार गर्द होंगे कम, दो-चार रंग जियादा

________________


बस करवटों में रात चली जाएगी शायद,
मैं साहिलों पे डूबता-उठता हीं रहूँगा?

इन सलवटों में एक किनारा तो हो तेरा...

________________


लिफाफे जिस्म के खोले बहुत पर,
कहीं भी रुह की चिट्ठी पढी तूने नहीं...

खुदा ने "इश्क़" लिख भेजा था उनमें...

_________________


न मैं "मेहमान" हो पाया उस घर का,
न तुम हीं "परिवार" हो पाई मेरी..

दोनों घर अजनबी हो गए..बस...

- Vishwa Deepak Lyricist

Friday, September 21, 2012

ज़िंदगी , मौत


उतार दूँ ज़िंदगी का ये चोंगा,
कि पैरहन मौत के लाजवाब-से हैं..

बस इक आलस ने रोक रखा है मुझे...

_________________


रात तिनके-सी उड़ती आती है और
चिमटे-सी खींच कर ले जाती है साँस को...

मैं जलाता हूँ या जलता हूँ - मालूम हीं नहीं चलता...

________________

हंगल साहब के लिए:

इक "सन्नाटे" ने छोड़ा शोर का साथ,
अब आवाज़ को ऊँगली पकड़ाए कौन?

वो गया तो अदब-ओ-सुकून ले गया..

________________


उतार ले मुझको मेरी इस ज़ात से,
कि मैं उकता गया हूँ ज़ब्त हो-हो के...

कभी अश्क़ों की बेड़ी तो कभी बीड़ा है सपनों का...

_________________


ज़िंदगी दो घूँट लूँ
या ज़िंदगी से छूट लूँ...

इख्तियार खुद पे न इख्तियार आप पे....

- Vishwa Deepak Lyricist

Thursday, September 20, 2012

लफ़्ज़, कविता, ख़ुदा


मुझे मत दिखाओ सिगरेट का बुझा हुआ ठूंठ,
मैं खुद हीं जलके बुझता हूँ फिल्टर-सा हर समय...

सौ लफ़्ज़ गुजरते हैं.. जलती है शायरी तब..

_________________


मानी छांट के लफ़्ज़ वो टांकता है पन्नों पे,
संवारके हर हर्फ़ फिर वह शायरी सजाता है..

चार "आह-वाह" लोग अर्थी पे डाल आते हैं...

________________


मैंने लिखते-लिखते चार-पाँच उम्रें तोड़ डालीं,
यह वक्त इसी हद तक मुझपे मेहरबान था...

कुछ और गर जो होता तो जीता मैं भी आज

________________


सोच हलक में अटकी है,
शब्द चुभे हैं सीने में..

दर्द की हिचकी आती है..

_________________


क्या सुनेगा वो मेरी फरियाद को,
जो खुद हीं फरियादों से है लापता...

क्या ख़ुदा? कैसा ख़ुदा? किसका खु़दा?

- Vishwa Deepak Lyricist