Friday, October 05, 2012

देवता


मैं तुम्हारी एक बूँद हँसी के लिए,
डाल सकता हूँ कोल्हू में अपनी दो "मन" साँसें...

जानता हूँ कि
तेल निकलेगा और चढेगा किसी देवता पर..

देवता,
जो कतई मैं नहीं!!!!!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Wednesday, October 03, 2012

कुकुरमुत्ता


कुम्हार की मिट्टी पे कुकुरमुत्ते-सा खड़ा हूँ मैं...
गदहे की टाँगों के इर्द-गिर्द पड़ा हूँ मैं...

कुम्हार ने उठाई खुरपी,
गदहे ने उठाई टांग,
और लो.. कोने में मरा हूँ मैं..

पर ये क्या...
मेरे अंदर का आदमी बोले
कि
गदहे की पीठ पर का घड़ा हूँ मैं..

तब तो कद में
गदहे से भी बड़ा हूँ मैं....

कुकुरमुत्ते-सा खड़ा हूँ मैं...

- Vishwa Deepak Lyricist

Sunday, September 30, 2012

धर्मम् शरणम् गच्छामि


वे आस्तिक हैं..... हमें धर्म से डराते हैं..

ये नास्तिक हैं... हमें "हमारे" धर्म से डराते हैं
और खींचना चाहते हैं अपने धर्म की ओर
जहाँ हर दूसरा धर्म कचरा है
और "कचरा" बताना हीं इनका धर्म है,
ऐसा कहकर ये मजबूत कर रहे होते हैं
अपने धर्म की इमारत, मूर्तियाँ और "अध-कचरी" विचारधारा...

वे आस्तिक हैं... धर्म में.. धर्म-ग्रंथों में... अपने हिसाब से...

ये नास्तिक हैं, जो सारे धर्म-ग्रंथों को खारिज़ करके
लिखते हैं अपना हीं एक "धर्म-ग्रंथ"
जिसे "अंध-विश्वास" की हद तक
निगल लेते हैं इन्हें मानने वाले... "अफीम" के साथ;
अफीम, जो इनके किसी "क्रांतिकारी" ने
आस्तिकों के हीं आस्तीन से उठाई थी....

अब नशे में हैं... आस्तिक,नास्तिक... दोनों हीं..

दोनों ने सवाल करना छोड़ दिया है अपने-अपने धर्म से..

इस तरह...
आस्तिक हो गए हैं दोनों हीं.. किसी-न-किसी धर्म में..
और
हम धर्म-भीरू पिसे जा रहे हैं.. .दोनों धर्मों के पाटों के बीच...

हम..जिनके लिए धर्म का मतलब कुछ और हीं होना था!!!!

- Vishwa Deepak Lyricist

Friday, September 28, 2012

कंजंक्टिवाईटिस है दुनिया को


उधर मत ताकना,
कंजंक्टिवाईटिस (conjunctivitis) है दुनिया को..

आँखें छोटी किए
बुन रही है
अपनी सहुलियत से हीं
रास्ता, रोड़े, रंग, रोशनी, रूह, रिश्ते... सब कुछ...

देख रही है
अपने हिसाब से हीं
तुझमें तुझे, मुझमें मुझे...

देख रही है
अभी तुझे हीं... आँखें लाल किए..


उधर मत ताकना,
बरगला लेगी तुझे भी;
बना लेगी
तुझे भी..खुद-सा हीं....

- Vishwa Deepak Lyricist

Tuesday, September 25, 2012

अहसासों के सावन में


बहुत हद तक जानता हूँ मैं तुम्हें,
तुम वही हो ना जो जानता है सब कुछ हीं...

ना ना, खुदा नहीं..खुशफहम हो..गप्पी हो..

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यक-ब-यक मैं बोल दूँ तुझको भी अपने-सा जो गर,
यक-ब-यक फिर तेरा भी अपना-सा मुँह हो जाएगा...

अपना-सा मुँह हो जाएगा तो खुद हीं मुँह की खाएगा...

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लिखने की ख्वाहिश छोड़ो भी,
लिखके ख्वाहिश बढ जाती है..

बढके ख्वाहिश मर जाती है..

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तुम्हें चाहिए हिन्दी! क्यों?
तुम्हें सा’ब नहीं बनना क्या?

'प्लीज़' कहो तो कृपा मिलेगी....

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उम्र झांक रही है तेरे चेहरे से,
खोल रही है जंग लगी खिड़कियाँ सभी..

नमी, नमक के गुच्छे हैं झुर्रियों के पीछे..
(अहसासों के सावन में ऐसे बंद न रहा करो)

- Vishwa Deepak Lyricist