उधर मत ताकना,
कंजंक्टिवाईटिस (conjunctivitis) है दुनिया को..
आँखें छोटी किए
बुन रही है
अपनी सहुलियत से हीं
रास्ता, रोड़े, रंग, रोशनी, रूह, रिश्ते... सब कुछ...
देख रही है
अपने हिसाब से हीं
तुझमें तुझे, मुझमें मुझे...
देख रही है
अभी तुझे हीं... आँखें लाल किए..
उधर मत ताकना,
बरगला लेगी तुझे भी;
बना लेगी
तुझे भी..खुद-सा हीं....
- Vishwa Deepak Lyricist
गर
मालूम हो कि
दो कदम पर मौत हो
और
कदम दर कदम
तुम चल रही हो साथ मेरे...
तो
किस तरह
उतार दूँ ज़िंदगी?
तुम्हारा रहना
कचोटता रहेगा मुझे
और
तुम्हारा जाना
भी तो
मौत से कम नहीं....
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तुम्हें छोड़ आया हूँ वहीं
जहाँ तुमने कभी छोड़ा था मुझे...
अबकी बार
चलो
साथ चलें दोनों
और लौट आएँ अपने-अपने रास्ते..
फिर
न तुम पर कोई इल्जाम,
न मुझ पर कोई इल्जाम...
- Vishwa Deepak Lyricist
बदचलन मेरी आदतें
गर आपकी
अर्दली हो जाएँ तो
मेरे माथे पे चढाया
बेहयाई का ये परचम
कुछ झुकेगा
या नहीं?
बोलिए तो...
आपकी गर मानें तो
मेरी इन हथेलियों के
आड़े-टेढे रास्तों पे
जो उतरते हीं नहीं है
आफताबी सात घोड़े
वो मेरी बदरंग तबियत
की मेहर है..
इसलिए गर
आपकी तदबीर से
माँगकर कुछ कोलतार
डाल दूँ इन
सरफिरी पगडंडियों पे
और कर दूँ
पक्की सड़कें मैं इन्हें
तो मेरी
माटी भरी तकदीर का
हो पड़ेगा काया-कल्प
या नहीं?
बोलिए तो...
बदसलूकी करते मेरे
अल्फ़ाज़ ये
आपके हम्माम में
धुलने लगें हर रोज़ तो
"बेरूखी" और "बेबसी" के हर्फ़ सब
बह जाएँगें..
यूँ हुआ तो
आपके खलिहान के
किसी छोर पे
इक लेखनी के वास्ते
एक-आध हीं सरकंडे मेरे
बोलिए
उग पाएँगे
या नहीं?
बोलिए तो...
- Vishwa Deepak Lyricist
रहेगा रास्तों में हीं उलझकर,
हमेशा जो सहारों पे जिया है...
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रहेंगे रास्तों में हीं उलझकर,
कहाँ मंज़िल पे ऐसी वादियां हैं...
उड़ेगी खाक तो सूरज डरेगा,
बड़ी गफ़लत में तेरी आंधियां हैं...
बड़े जो हो चले हैं बाजुओं सें,
बिना चप्पु की उनकी कश्तियां हैं...
तरफदारी करेंगी क्या हमारी,
कलाकारों की झूठी हस्तियां हैं...
हटा दो ज़िंदगी से ये लड़कपन,
कि अब शाइस्तगी की बाज़ियां हैं...
शाइस्तगी = culture, सभ्यता
- Vishwa Deepak Lyricist