Saturday, September 08, 2012

मैं जम्हूरियत का बागी हूँ


ना चमड़ी है जो खून जने,
ना दमड़ी हीं जो सिंदुर दे..

ले भटकोइयां और मांग सजा...

*भटकोइयां = खर-पतवार श्रेणी का एक पौधा जिसपे "मटर-दाने" की तरह के फूल उगते है और जिन्हें फोड़ने पर लाल रंग निकलता है

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वो काटता है जब माटी को,
माटी-सा कटता जाता है...

सोना सोता है संसद में..

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गदगद हैं पूँछ उगाकर सब,
जो कल तक मुझ-से इंसां थे..

मैं जम्हूरियत का बागी हूँ...

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तालीम जहां की ऐसी है,
हर शख्स करैला नीम-चढा..

चुप्पी भी ज़हर उगलती है..

- Vishwa Deepak Lyricist

Thursday, September 06, 2012

जब लिखता था


मैंने लिखना छोड़ दिया है!

साँस चला के रात-रात भर,
आँख जला के रात-रात भर,
बात बढा के बात-बात पर
मैंने टिकना छोड़ दिया है!

वक़्त से किरचे नोच-नोच कर,
ख्वाब के परचे नोच-नोच कर,
हवा में पुलिये सोच-सोच कर,
मैंने बिकना छोड़ दिया है!
मैंने लिखना छोड़ दिया है।

आँख में तेरी डूब-डूब कर,
साँस में तेरी डूब-डूब कर,
प्यास से तेरी खूब-खूब पर
मैंने सपना जोड़ लिया है,
तुझसे लिखना... जोड़ लिया है...

- Vishwa Deepak Lyricist

Monday, September 03, 2012

अजब मठाधीश है तेरा मानुष


उन्हें सुनाने से कुछ नहीं हासिल,
मगर सुना दूँ कि चोट पैदा हो..

मुझे पता है कि वो हैं इकरंगी,
समझ चढा लें कि खोट पैदा हो..

कहाँ "महा’"राज" उत्तर या दक्खिन,
अगर नफ़ा हो ना नोट पैदा हो..

अजब मठाधीश है तेरा "मानुष",
तुझे भुला दे जब वोट पैदा हो..

उसे भगाओगे किस तरह "तन्हा",
हवा-ज़मीं में जो लोट पैदा हो..

- Vishwa Deepak Lyricist

Sunday, September 02, 2012

महाराज का राजमहल


आपकी तशरीफ को जब भूख लगी
तो आपने
माँग लीं हमारे हिस्से की बेंच-कुर्सियाँ भी..

हम माटी से खींचकर फांवड़े-कुदाल
और समेटकर अपनी सारी उम्र
लौट गए
गर्भ की गहराईयों में,
बाँध लीं हमने गर्भ-नालें,
जन्मने के लिए फिर से कहीं और...

अब आपको भूख लगी है पेट की;
आपकी कुर्सियाँ, आपके अर्दली, आपके रसिक
नहीं उगा सकते नारों और घुंघरूओं में धान, गेहूँ,
नहीं बाँध सकते बाँध का पानी अपने बाजुओं से,
नहीं उगा सकते अपनी हथेलियों पर कल-कारखाने...

इनकी हथेलियों पर तो उगती हैं बस सोने की रेखाएँ..

कहिए...आप वही खाएँगे क्या?

नहीं ना?
तो फिर खींच लीजिए
हलक से अपनी अंतड़ियाँ
और भून कर निगल लीजिए भूख के साथ,
शायद ऐसे में तर हो जाए आपका पेट..
न बने इतने में भी
तो निगल लीजिए कुर्सियाँ, अर्दली , ज़मीन सब कुछ...

वैसे भी ये अर्दली आपके
न पीस सकते हैं आटा
जिसे आप डाल दें अपने "राज"-महल की नींव में
ताकि सेंध लगाने न आ पाएँ चीटियाँ...

चीटियाँ
जो आती हैं उत्तर से बस आपके लिए,
है ना "महा""राज"?

- Vishwa Deepak Lyricist

Saturday, September 01, 2012

एक उम्र तक की राह


एक उम्र तक की राह तो तुम देख लो पहले,
फिर सोच लेना कौन है तेरे साथ के काबिल..

एक उम्र तक की राह है पर उम्र से लम्बी,
एक साँस भर का हमसफर हीं है मेरी मंज़िल..

एक उम्र तक की राह जो तुम देखोगे ’तन्हा’,
तो जान लोगे पाँव किनके हो गएँ बुज़्दिल..

एक उम्र तक की राह फिर क्यों देखने बैठूँ,
जब इल्म हो कि रहबरों से कुछ नहीं हासिल..

- Vishwa Deepak Lyricist