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Wednesday, July 05, 2023

लिखूँगा

गीतों में, गज़लों में एक चहारदीवारी है। मैं तुम्हारे प्रेम को लिखूँगा एक अकविता में। . असमझा एक विषय, अनुपजा एक ख्याल, या फिर अनलिखी एक कविता - प्रेम यही है। . क्या हीं लिखूँगा! . बस महसूसूँगा।

Friday, January 22, 2010

चाक जिगर (बेरहम वक्त)


male:

बेरहम वक्त जो टुकड़ों में तेरी याद की चिट्ठी देता है,
यूँ लगता है कातिल मेरा मेरी लाश पे मिट्टी देता है।

मैं चिट्ठी ना पढ पाता हूँ,
बस हर्फ़ों में गड़ जाता हूँ,
लफ़्ज़ों के सूखे शाख से मैं
तेरा नाम तोड़कर लाता हूँ,
तेरे नाम से फिर मैं जानेमन तेरा चेहरा बुन लेता हूँ,
रूख्सार पे फैले अश्कों से मैं चाक जिगर सुन लेता हूँ।

female:

बेरहम रात जो कुछ पल को तुझे मेरे ख्वाब में लाती है,
यूँ लगता है मेरी मौत यहाँ मुझको जीना सिखलाती है।

मैं जीकर भी कहाँ जिंदा हूँ,
इन साँसों पे शर्मिंदा हूँ,
फुरकत की कालकोठरी में
मैं बरसों से बाशिंदा हूँ।
मैं तो हिज्र की चारदीवारी पे तेरा चेहरा जड़ लेती हूँ,
रूख्सार पे फैले अश्कों से मैं माँग मेरा भर लेती हूँ।

male:

मैं दर्द का बस आदमकद हूँ,
ज़ख्मों से सना हुआ ज़द हूँ,
बदकिस्मत हूँ इस हद तक कि
हर बरबादी की मैं हद हूँ,
अंदर तक छिला हूँ ऐसे कि
जैसे मैं गमों का बरगद हूँ,
मैं दर्द का बस आदमकद हूँ....

female:

मैं तो जलती हूँ सहराओं में,
गम की इन गर्म हवाओं में,
ना बूँद वस्ल की दिखी मुझे
अंबर पे बिछी घटाओं में,
ना सब्र हीं बनके मिला मुझे,
क्यों एक भी लाख खुदाओं में?
मैं तो जलती हूँ सहराओं में.....

male:

बेरहम वक्त जो टुकड़ों में तेरी याद की चिट्ठी देता है,
यूँ लगता है कातिल मेरा मेरी लाश पे मिट्टी देता है।

female:

बेरहम रात जो कुछ पल को तुझे मेरे ख्वाब में लाती है,
यूँ लगता है मेरी मौत यहाँ मुझको जीना सिखलाती है।


-विश्व दीपक

Tuesday, December 22, 2009

मस्ती के पंगे


चंगे....मस्ती के पंगे..

मुट्ठी में मन?
तौबा!!
झूठे बंधन?
तौबा!!
बासी राशन?
तौबा!!
जाली शासन?
तौबा!!
अकड़म-बकड़म ऐं वैं
दुनिया को बेड़ी दे के,
खुल्लम खुल्ला जी ले
तू सब को एंड़ी दे के।

बेबस दुश्मन
वाह-वाह!!
कातर जोखम
वाह-वाह!!
मुर्दा चिलमन
वाह-वाह!!
पुख्ता जीवन
वाह-वाह!!
चुनकर-बुनकर रख ले
इस पल को साफी दे के,
हँसकर कसकर जी ले
तू सब को माफी दे के।

पंगों की रात...
ज़िंदाबाद!!!


-विश्व दीपक

Wednesday, December 09, 2009

थोथा चना


क्यों,
शर्मिंदा है खुदा,
क्यों,
पोशीदा है खुदा।
क्यों,
बिखरी-सी है जमीं,
क्यों
सिमटी-सी है ये गीली हँसी, खिली खुशी।

क्यों,
शाखों पे है खिज़ा,
क्यों,
आलुदा है फ़िज़ा।
क्यों,
बेगैरत है जुबां,
क्यों,
सचमुच है ये कि थोथा चना, बाजे घना।

क्यों
हरसू है बस धुआँ,
क्यों
फैली है बद-दुआ,
क्यों
उजड़ा-सा है जहां,
क्यों
ऐसे हैं सब कि नींदे गवां जिये यहाँ।

क्यों
सरहद है हर कहीं,
क्यों
दौलत है दिल नहीं,
क्यों
गैरों-से हैं सभी,
क्यों
दौड़े हैं यूँ कि तोड़ी घड़ी छोड़ी खुदी।


-विश्व दीपक

Monday, October 05, 2009

चुपचाप


मैं चुपचाप फिरता हीं रहा!

ना चाँद को कोई थपकी दी,
ना दूब की तोड़ी कमर,
ना साँस को दी आहटें,
ना नींद की खींची चुनर,
बस एक तुम्हारे ख्वाब में-
चुपचाप फिरता हीं रहा।

मैं जहाँ था, उस जहां में चाहतों की चाशनी थी,
पक रही थी, रात जिस में ,मीठी-मीठी चाँदनी थी,
साँवला-सा आसमां था,
कुछ-कुछ तेरी आँखों-सा था,
और उसकी तलछटी में
ख्वाब कोई बुन रहा था।
सौंधी-सौंधी शबनमी-सी,
पीली-पीली रोशनी-सी,
मिट्टी दिल की घुल रही थी,
धुल रहा था मैं वहीं पर
तू वहीं पर खुल रही थी।

क्या कहूँ मैं, क्या हुआ जब, शब तले हम दो मिले,
यूँ लगा कि, बस तुम्हीं से, तारों के हैं काफ़िले,
मनचला जो आसमां था,
सब तुम्हीं को दे रहा था।
गीली-गीली संदली-सी ,
भीनी-भीनी अंबरी-सी,
खुशबू छन के उड़ रही थी,
मुड़ रहा था दिन वहीं पर,
रूत सुबह से जुड़ रही थी।

मैं चुपचाप फिरता हीं रहा।


-विश्व दीपक ’तन्हा’

Wednesday, September 16, 2009

मेरे खुदा (एक हीं गाना दो रूपों में)


१) यथार्थपरक (realistic)

मुखड़ा:

male:
तू हीं बता, मेरा जहां, तेरे सिवा, होगा कहीं,
बांटे कोई , दर्द-ए-निहां, ऐसा खुदा, होगा कहीं।

female:
तू है मेरा, यही सदा, यही दुआ, होगी मेरी,
तेरी हँसी, तेरी खुशी, मेरे खुदा, होगी मेरी।

अंतरा 1:

female:
ऐसी कहाँ ,होती फ़िज़ा, तू जो यहाँ, होता नहीं,
male:
तेरे बिना, मेरा कहीं, नामो-निशां, होता नहीं।
female:
है ये यकीं, या है गुमां, तू है वफ़ा, मेरे लिए,
male:
वाह रे अदा, तू जो हुई, मुझसे खफ़ा, मेरे लिए।

female:
तू है मेरा, यही सदा, यही दुआ, होगी मेरी.
male:
तू हीं बता, मेरा जहां, तेरे सिवा, होगा कहीं।

अंतरा 2:

male:
मुझको मिली, जो भी खुदी, माह-जबीं, वो है तेरी,
female:
मेरी सभी, नेकी बदी, शाह-ए-जमीं, वो है तेरी।
male:
आओ चलें, साँसों तले, दूजा जहाँ, कोई न हो,
female:
नूर-ए-खुदा, रवाँ रहे, झूठा जहाँ, कोई न हो।

male:
तू हीं बता, मेरा जहां, तेरे सिवा, होगा कहीं,
female:
तू है मेरा, यही सदा, यही दुआ, होगी मेरी|



२) काल्पनिक (fantasy)

मुखड़ा:

male:
यूँ हीं कभी, हो जाए यूँ, तू हो यहाँ, कोई न हो,
मैं बस सुनूँ, तेरी सदा, बाते तेरीं, सोई न हो।

female:
यूँ हीं कभी, हो जाए यूँ, पूरी सदी, पल में खुले,
उमड़े यहाँ, अब्र-ए-नशा, सारा जहां, हममें घुले।

अंतरा 1:

female:
तेरी हँसी , ओढूँ कभी, रूह में तेरी, सो लूँ कभी,
male:
तुझको रखे, बाहों में जो, मैं वो हवा, हो लूँ कभी।

female:
तेरे दिल से, मेरे दिल तक, डालें कभी, रस्ता कोई,
male:
रत्ती भर भी, दूरी हो तो, रहने न दें, दरिया कोई।

मेरे खुदा........................

अंतरा 2:

male:
तेरे लब पे, गुलमोहर की, सुर्ख कली, खिलती रहे,
female:
तेरी जाँ से, साँसें मेरी, बनके नदी, मिलती रहे।
male:
तू जो अगर , धरती न दे, तलवों तले, सूई चुभे,
female:
रेशम भी तो, खार बने, तेरे बिना, रूई चुभे।

मेरे खुदा........................


male:
यूँ हीं कभी, हो जाए यूँ, बाद-ए-सबा, तुझसे चले।
female:
यूँ हीं कभी, हो जाए यूँ, ज़िक्र-ए-वफ़ा, तुझपे ढले।
मेरे खुदा..............


-विश्व दीपक ’तन्हा’

प्रेयसी (एक नए अंदाज़ में)

मुखड़ा:

female:
बस तुझे, हाँ तुझे, देखूँ शामो-सुबह,
तू रहे, सामने, जी लूँ पूरी तरह।

male:
क्या कहूँ, मैं तुझे, मैं हूँ जो भी यहाँ,
रब की सौं, तू हीं है, सब की सारी वज़ह।

female:
इतनी-सी, बात है, तू है मेरा जहां।

अंतरा 1:

female:
ये तो कभी हुआ नहीं, मुझे अपनी फ़िक्र हीं ना रहे।

male:
तुझे पाके हुआ वही, कहीं जिसका जिक्र हीं ना रहे।

female:
आज हीं पाई है, मैने ऐसी दुआ,
तूने ज्योंहि छुआ,
कुछ न कुछ है हुआ।

male:
मैने भी तुझसे हीं सीखी है ये अदा,
सब कहें, प्यार पर, है ये कोई खुदा।

अंतरा 2:

male:
यूँ हीं नहीं तुझे चाहूँ, मुझे तुझमें जश्न कोई दिखे।

female:
है ये वही तेरी चाहत, मुझे जिसमें अगन कोई दिखे।

male:
मेरी तू, तेरा मैं, सच है सनम यही,
अब ये कसम रही,
हो ना जुदा कभी।

female:
बस तुझे, हाँ तुझे, देखूँ शामो-सुबह,
तू रहे, सामने, जी लूँ पूरी तरह।

male:
क्या कहूँ, मैं तुझे, मैं हूँ जो भी यहाँ,
रब की सौं, तू हीं है, सब की सारी वज़ह।

female:
इतनी-सी, बात है, तू है मेरा जहां।


-विश्व दीपक ’तन्हा’

Wednesday, August 12, 2009

दोस्ती

यह भी एक पुरानी कविता हीं है। आज यकायक इस पर नज़र गई तो सोचा कि क्यों न इसे औरों से शेयर किया जाए। दर-असल इसे एक गीत की तरह लिखा गया है और उम्मीद भी यही है कि एक न एक दिन इसे संगीत का सहारा मिलेगा। देखते हैं।

बेतहज़ीब कलह कर के
फिर
बेतरतीब ज़िरह कर के
फिर
बेतरकीब सुलह कर के
यूँ बानसीब अश-आरों में,
बनकर हबीब हम यारों मॆं,
खुशरंग ढंग जो रहते हैं,
बिंदास बोलकर हम उनको
अपनी हीं जिंदगी कहते हैं।

एक चाँद भरोसे जीने की,
एक काशी, एक मदीने की,
एक सीपी, एक नगीने की,
ना कभी...
ना कभी आरजू हममें पली,
हर दिल में जुदा हीं आग जली,
लेकिन अब तो
एक मर्ज़ है जो,
हम यार सभी,
गुलज़ार सभी,
एक नार-नवेली, अलबेली की
यादों में संग-संग बहते हैं,
हर करवट पर हीं लड़ते हैं,
इस लिए हीं तो,
हम यारों को
अपनी हीं जिंदगी कहते हैं।

उन नर्म धुंध की बस्ती में,
वादी की उथली कश्ती में,
फाहों की फुहड़ मस्ती में,
हम सभी.....
हम सभी फलक-सा ढलते थे,
बस अधखुली नींद में चलते थे,
लेकिन अब तो,
शब सर्द न क्यों,
हम सब मदहोश,
लिए जोश-खरोश,
बर्फानी साजिश, मीठी बारिश में
खुलेआम जंग-ए-रूत सहते हैं,
दो बूँद चाय पर मरते हैं,
इस लिए हीं तो
हम यारों को
अपनी हीं जिंदगी कहते हैं।

सफर के कोरे रोड़ों का,
लू के बेदर्द झकोरों का,
सौ दंश का, सौ हथौड़ों का,
जो तभी...
जो तभी न भाया जिक्र हमे,
थी यूँ टका-चैन की फिक्र हमें,
लेकिन अब तो,
यह राह हीं ज्यों,
हम सब के लिए,
बस ,लगे,. जिये,
सुनसान सड़क और चार बाईक,
हम निडर उमंग में दहते हैं,
पैसों पर पेट्रोल जड़ते हैं,
इस लिए हीं तो
हम यारों को
अपनी ही जिंदगी कहते हैं।


-विश्व दीपक ’तन्हा’