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Wednesday, December 09, 2009

थोथा चना


क्यों,
शर्मिंदा है खुदा,
क्यों,
पोशीदा है खुदा।
क्यों,
बिखरी-सी है जमीं,
क्यों
सिमटी-सी है ये गीली हँसी, खिली खुशी।

क्यों,
शाखों पे है खिज़ा,
क्यों,
आलुदा है फ़िज़ा।
क्यों,
बेगैरत है जुबां,
क्यों,
सचमुच है ये कि थोथा चना, बाजे घना।

क्यों
हरसू है बस धुआँ,
क्यों
फैली है बद-दुआ,
क्यों
उजड़ा-सा है जहां,
क्यों
ऐसे हैं सब कि नींदे गवां जिये यहाँ।

क्यों
सरहद है हर कहीं,
क्यों
दौलत है दिल नहीं,
क्यों
गैरों-से हैं सभी,
क्यों
दौड़े हैं यूँ कि तोड़ी घड़ी छोड़ी खुदी।


-विश्व दीपक