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Sunday, February 04, 2018

तेरे सीने से मेरे सीने तक


वो चली
अटखेली
तेरे सीने से
मेरे सीने तक|

मैं होश बचाकर क्या जीतूँ ?
तुझे आँख चुराकर क्या हासिल?
हम मिलकर साँस -साँस बोएँ,
दो दिलके आस-पास बोएँ,
जन्मे तो दोनों का हिस्सा,
कुछ मेरा- कुछ तेरा किस्सा,
एक मीठी-सी
निम्बोली
तेरे सीने से
मेरे सीने तक|

तू बारिश हो ले भादो की
मैं अगहन की सौंधी-सी धूप ,
हम साथ-साथ थिरकें-ठिठकें
ले-लेकर एक-दूजे का रूप!
हम कभी मेंड़ ,कभी खेत बनें,
फल , मिट्टी , पानी, रेत बनें,
हम हर मौसम की छाया हों,
हर मौसम हममें समाया हो,
खुशियों की
यह रंगोली
तेरे सीने से
मेरे सीने तक |

ये चली
अटखेली ......

- Vishwa Deepak Lyricist

Thursday, October 25, 2012

दो फांक


रेवड़ी के भाव
या
चाय-चानी के सही अनुपात में
हर साँस
तुम्हें तौलना-मापना होता है
मेरा प्यार...

मैं गुलाब-जल या केवड़े की तरह
अपनी नसों में
महसूसता रहता हूँ
तुम्हारी मौजूदगी...

तुम समष्टि में व्यष्टि ढूँढती हो
और मैं व्यष्टि में समष्टि..

बस इतना हीं फर्क है
मेरे चाहने
और तुम्हारे
चाहे जाने की चाह रखने में...

बस इतना हीं फर्क है
जो
दो फांक किए हुए है... हम दोनों को!!!!

- Vishwa Deepak Lyricist