Thursday, November 12, 2009

इश्क़ है या कोई वारदात है?


सोलह आने खरी बात है,
नाजुक-सी तू करामात है,
लील लियो जो धर्म-जात है...

राम कसम क्या खुराफ़ात है,
वशीकरण या मुलाकात है,
लगे- इश्क़ भी तेरे साथ है।


-विश्व दीपक

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Saturday, November 07, 2009

मोहे पागल कर दे..


मोहे पागल कर दे!!

इश्क़ की बूटी
डाल के लूटी,
ओ री झूठी,
सच कह -
तूने पाई कहाँ से
प्यार-मोहब्बत की यह घुट्टी,
खुद तो हुई बावरी फिरती,
मेरी भी कर दी है छुट्टी।
अब जो तेरे जाल में हूँ तो
नैनन से हीं घायल कर दे,
सुन री...मोहे पागल कर दे।

बोल रसीले,
छैल-छबीले,
थोड़े ढीले,
बह कर-
मेरी ओर जुबाँ से
बने बनाए बाँध को छीले,
खुद तो मुझमें प्यास जगाए,
फिर मेरी चुप्पी को पी ले।
अब जो तेरी झील में हूँ तो
सावन का हीं बादल कर दे,
सुन री...मोहे पागल कर दे।

रूप की गठरी,
रंग की मिसरी,
लेके ठहरी,
मुझ तक-
तेरी आन पड़ी है
जान-जिया की माँग ये दुहरी,
खुद तो चाल चले है सारी,
फिर मुझसे पूछे क्या बहरी।
अब जो तेरे साथ में हूँ तो
जोबन का हीं कायल कर दे,
सुन री...मोहे पागल कर दे।


-विश्व दीपक

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Wednesday, November 04, 2009

खिलंदड़ इश्क़


ये इश्क़ न जाने बात-बतंगड़,
इश्क़ तो है ये बड़ा खिलंदड़..

बिन पूछे आ जावे है ये,
बिना जोर भा जावे है ये,
चुपके-चुपके चैन-वैन के
रसद सभी खा जावे है ये,
तोल-मोल के नींद हीं देवे,
आँख तले छा जावे है ये,
बड़ा बेरहम बेदर्दी है,
आके कभी ना जावे है ये.

रहे कोई ना रहे कोई
पर इश्क़ जिये बन मस्त कलंदर,
इश्क़ तो है ये बड़ा खिलंदड़।

शाम ढले ये कसक जगावे,
चाँद तले एक झलक दिखावे,
सात साधुवन की संगत में
सात जन्म के सबक बनावे,
बात-बात में आसमान के
कैनवास को लपक हिलावे,
रात गई फिर तारे चुनके
ख्वाब गढे जो पलक पे आवे।

कहे कोई ना कहे कोई
पर इश्क़ लगे है कोई धुरंधर,
इश्क़ तो है ये बड़ा खिलंदड़।


-विश्व दीपक

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है नशा....

कहें इसको इश्क या,
खलल, जादू, बद्दुआ,
जाने मुझको क्या हुआ,
है नशा!!

यह रूत, ये वादियाँ,
कहती यह अनकहा,
मेरे दिल का आईना,
बावफ़ा!!

कुछ हैं गिरी,कुछ खो गईं, हुई मोम सी,मेरी दास्तां,
मेरा जो हाल, बदहाल है, कह दूँ इसे, इश्क क्या?

जाने मुझको क्या हुआ,
क्यूँ हूँ मैं गुमशुदा,
दिल का ये फलसफा,
ना पता!!!

हाँ तो, कैसे, बेगानों में घुल-मिल रह लूँ,
घुट के, बोलो, मझधार को साहिल कह लूँ?
रहबर, आँखें, जिसे कह दे मंजिल ,बह लूँ,
ना हो, हाँ हो, दोनों का हासिल सह लूँ।

बस मुझसे , तू कुछ कहे...

मेरे रब की ये अदा,
है रब-सी बाखुदा,
हर पल हीं जो रहा,
बेजुबां!!

देखो, आहिस्ता,दिल मेरे दिल ये लगाना,
रौनक, दुनिया की, धोखा है धोखा न खाना,
करवट, करवट, ख्वाबों का घर न सजाना,
पर हाँ, जानो कि,वो आयें, जरा शर्माना,

कभी मुझसे, वो कुछ कहे...

दिलवर जो हो जुदा,
महुए का भी नशा,
बन जाए नीम-सा,
बेमजा!!

ओ आसमां, पलकें बिछा, जिसको कहे तू , हमनवा,
चुपचाप हीं, रजनी तले, क्या कभी हुआ, मेहरबां?

मेरे दिल की है सदा,
उनको भी कुछ हुआ,
है यह सारा मामला,
इश्किआ!!!


-विश्व दीपक

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Thursday, October 29, 2009

बेतरतीब-से कुछ ख्यालात

यह भी तो हद है कि हद जानता नहीं मैं,
ज़िंदा हूँ और ज़िंदगी को मानता नहीं मै।

पल हीं में राख कर दूँ मैं सूरज के शरारे,
कुव्वत है फिर भी बेवजह ठानता नहीं मैं।

अब होश है तो वक्त की भी खैर-खबर लूँ,
ऐसे तो दिन-महीने भी पहचानता नहीं मैं।

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क़ज़ा आना तो यूँ आना कि दुनिया को खबर न हो,
बिना मतलब की बातों से तेरा जीना दुभर न हो।

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खुदा मेरी खुदी का जो तलबगार हो गया,
बिना कहे कोई मेरा मददगार हो गया।

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इश्क उन आँखों को ज़ीनत देता है,
गुफ़्तगू की हद तक हसरत देता है।

मैं नज़रें कभी फ़ेरता हीं नहीं,
भरसक वो मुझे मोहलत देता है।

बस बन जाते हैं सच्चे-से बहाने,
वक्त दोस्तों को ये बरकत देता है।

नब्ज थमते हीं सुकूँ आ जाएगा,
होश ऐसे किधर फुरसत देता है।

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करीने से मुझे सोचे , गया हर वक्त याद हो,
तभी तो जां मिले मुझको, तबियत मेरी शाद हो।


-विश्व दीपक

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