कब इश्क बेईमान हो जाए , क्या खबर !
कभी अपने गलीचे के पत्थरों को देखना,
दब-दब के मोम हो पड़े हैं सारे हमसफ़र !!
तेरे अलावा लब्ज़ इक बचा न शेर में,
वल्ला! तुम्हें है चाहती ,गज़ल किस कदर!
उनतीस बिछोह झेलकर हीं इंतज़ार में,
हर माह, माह एक शब जाए है तेरे घर!
सीसे-सबा पे, आब पे जादू किया है यूँ ,
खुशबू घुली है तेरी, बस आए तू नज़र।
किस नाते,तुझे देखकर जी रहा हूँ मैं,
हो जो भी, है तो साफगोई मेरे में मगर।
होने में तेरे देखता हूँ अक्स आप का,
खुद के बिना यूँ कैसे,'तन्हा' करे बसर।
-विश्व दीपक ’तन्हा’