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Wednesday, July 16, 2008

बाजार

मिन्नतें बाजार में बाजार से करते रहे,
मोल अपनी रूह का बेज़ार-से करते रहे।

शुक्र है कि जिंदगी रास्ते आई नहीं,
रास्तों का सर कलम लाचार-से करते रहे।

बेच ना डाले कहीं सारे हीं आसमान,
पीछा अपने आप का रफ्तार से करते रहे।

मौजज़न साँसें सभी ना समाये देह में,
शिकवा अपने भाग्य का मझधार से करते रहे।

जाना, हमने पाई जो काफ़िरों की बेरूखी,
अपने होने का गुरूर बेकार-से करते रहे।

काफिला-दर-काफिला जागती रेत को
जख्मी सब दर्दे-निहाँ दो धार से करते रहे।

-विश्व दीपक ’तन्हा’

Wednesday, April 23, 2008

मीठा-सा अक्स

ना इस कदर उघारो तुम हुस्न का हुनर,
कब इश्क बेईमान हो जाए , क्या खबर !

कभी अपने गलीचे के पत्थरों को देखना,
दब-दब के मोम हो पड़े हैं सारे हमसफ़र !!

तेरे अलावा लब्ज़ इक बचा न शेर में,
वल्ला! तुम्हें है चाहती ,गज़ल किस कदर!

उनतीस बिछोह झेलकर हीं इंतज़ार में,
हर माह, माह एक शब जाए है तेरे घर!

सीसे-सबा पे, आब पे जादू किया है यूँ ,
खुशबू घुली है तेरी, बस आए तू नज़र।

किस नाते,तुझे देखकर जी रहा हूँ मैं,
हो जो भी, है तो साफगोई मेरे में मगर।

होने में तेरे देखता हूँ अक्स आप का,
खुद के बिना यूँ कैसे,'तन्हा' करे बसर।


-विश्व दीपक ’तन्हा’

Tuesday, April 22, 2008

जहां...एक गज़ल


जब तलक हम बेजान थे,
इन रिश्तों के आन-बान थे।

साँस लूँगा तो धड़केगा दिल,
यही सोच ,हम हलकान थे।

रात भर जिस्म तला जिनने,
अपने थे, पिता-समान थे ।

गम कमजोर ना रहा मेरा,
तुम सभी जो कद्रदान थे।

'अति' बुरी है क्यूँकर जबकि,
पिटे वही जो बेजुबान थे।

बेवा,बच्चे हैं भूखे उनके,
इस देश पर जो कुर्बान थे।

आँखें चुभी तो जाना हमने,
अश्क-से सभी इंसान थे।

मंच सजते हैं,जहाँ पहले,
गालिब के नामो-निशान थे।

अब तन्हाई भी नहीं अपनी,
इस ज़फा से हम अंजान थे।


-विश्व दीपक ’तन्हा’