Saturday, October 16, 2010

दुनिया तो अक्कड़-बक्कड़ है


ये दुनिया लाल-बुझक्कड़ है,
यहाँ डेग-डेग पे चक्कर है,
बोली में सौ मन नीम भरा,
लल्लो-चप्पो में शक्कर है..

तुम भी तो कुछ पासे फेंको,
शेखी बघार लो.. टक्कर है,
या फूंक डालो घर अपना हीं,
सब कहेंगे दुखिया, फक्कड़ है..

अरे बचो, देह न तोड़ दे ये
सच जानलेवा है, झक्कड़ है,
क्यों इसे सुधारने बैठे हो,
दुनिया तो अक्कड़-बक्कड़ है...


-विश्व दीपक

मन खरा सोना है


मन मूंगा है, मन माटी है,
मन खरा सोना है... खांटी है..

मन तेरे मन की जाने है,
जहाँ नौ-नौ मन तो बहाने हैं,
जो तू मन से मुझको चाहे है,
तो ये नखरे काहे उगाहे है,
मन मार ना... मन को कोस न तू,
मन दे दे... मन यूँ मसोस न तू...
कि मेरे नाजुक मन को तेरा
मन रोज़ी-रोटी है... लाठी है..
मन खरा सोना है... खांटी है..


-विश्व दीपक

उसे इंसान कहना कितना जायज है


एक इंसान जिससे नफ़रत है मुझे...
कभी-कभी यह सोचता हूँ कि
उसे इंसान कहना कितना जायज है..

वह बढना जानता है
किसी भी कीमत पर..
कल दो नरमुंडों पर चढकर
छह इंच और ऊँचा हो गया..

नरमुंड... उसी के माँ-बाप के..

दूसरों की साँसें चुराकर
अपनी उम्र में ठूंसता है,

साँसे... उसी के चापलूसों की..

हाड़-माँस से सिला
एक अभिशाप है.. वह इंसान
जिससे नफ़रत है मुझे...


-विश्व दीपक

ज़िन्दगी का खर्चा है


इश्क़-विश्क़ के इम्तिहान में,
अव्वल आने को हर कोई
नकल कर रहा खुलेआम हीं
लिए दिल में दिल का पर्चा है..

मगर ध्यान रहे.
पकड़े गए तो
दुनिया की इस कोतवाली में
तुरंत जमानत पाने खातिर
एक ज़िन्दगी का खर्चा है.


-विश्व दीपक

बेशरम चटोरी है


दिन का कनस्तर है
रात की कटोरी है,
धूप-घाम थोक में है
ओस थोड़ी-थोड़ी है,
अंबर पे क्या कोई
तिलिस्मी तिजोरी है?
रोज़-रोज़ उपजे है
रोज़ की हीं चोरी है..

धरती की भूख तो
बेशरम चटोरी है,
तिल-तिल निगले है
तिस पे सीनाजोरी है..


-विश्व दीपक