Wednesday, June 29, 2011

न मौत आई


male:
न मौत आई, न तू आई, न तेरी कुछ खबर आई,
हकीकत है तेरे दर से मेरी खाली नज़र आई।

female:
न ग़म बीता, न दिल जीता, न शब की हीं सहर आई,
हक़ीकत है तेरे दर से मेरी खाली नज़र आई।

male:
वो कल का दिन सुहाना था,
जो तेरा आना-जाना था,
मोहब्बत के तराने थे,
मिलन के सौ बहाने थे,
जो नदियाँ सुर सजाती थीं,
हवाएँ साथ गाती थीं,
हिलोड़े हम जो भरते थे,
तो दूजे रश्क करते थे,
लो अब हम हैं जुदा ऐसे
कि अश्कों के खुदा जैसे
मेहरबां हो गए हमपे,
कहूँ क्या मैं मेरे ग़म पे?
सितम है ये कि किस्मत में बचा तक़दीर का रोना,
ये मैं जानूँ क्या होता है किसी मनमीत का खोना।

female:
वो कहते थे तू झूठा है,
मुझे तूने तो लूटा है,
पर दिल ने ये गवाही दी,
भले लाखों मनाही थी
कि बस तू है सगा मेरा,
तो तू कैसे दगा देगा,
तू मेरा है तू आएगा,
मुझे अपना बनाएगा,
पर सब सपने टूटे ऐसे,
हों पानी के बने जैसे,
मैं हारी राह तक-तक के,
भुला दूँ मैं तुझे थक के?
सितम है ये कि किस्मत में लिखा तस्वीर को ढोना,
तू क्या जाने क्या होता है किसी मनमीत को खोना।

male:
वो पत्थर की हवेली थी,
जहाँ पर तू अकेली थी,
वहाँ जो राह जाती थी,
गली बनके समाती थी,
यहाँ तक तो मैं आया था,
दिलो-जां साथ लाया था,
तेरी ख्वाहिश सजाई थी,
पर दर पे अंधी खाई थी,
मैं तब भी हौसले में था,
पर रास्ता हीं ना मिला,
तुझे कितना पुकारा था,
तू न आई, मैं क्या करता?
सितम है ये कि किस्मत से मुझे मजबूर था होना,
हाँ मैं जानूँ क्या होता है किसी मनमीत का खोना।

female:
न ग़म बीता, न दिल जीता, न शब की हीं सहर आई,
हक़ीकत है तेरे दर से मेरी खाली नज़र आई।

male:
न मौत आई, न तू आई, न तेरी कुछ खबर आई,
हकीकत है तेरे दर से मेरी खाली नज़र आई।


-विश्व दीपक

-विश्व दीपक

Sunday, May 29, 2011

पी रे


तड़पत है मन पी रे,
तरसत क्षण क्षण जी रे,
भिनसर से आये ना बलमा...

निर्मोही रे!
निकसत है दम मोरा,
बरजोरी करजोरी पीऊ
कसहुँ मैं दर्शन लूँ तोरा..

फुरसत में इत आ जा,
मुहुरत में चित आ जा,
अनबन से रोए है जियरा..

मुरझायो अंखियन की तुलसी का बिरवा,
अंसुवन से उबले है निंदिया..

सुमिरूँ मैं तोहे पी,
कुछुहुं ना सोहे जी,
बिंदिया न नथनी न झुमका न कंगना..

पकड़त हूँ पैयां मैं,
बिखरत हूँ सैयां मैं,
जी लूँ जो धरि ले तू बइयां..

तड़पत है मन पी रे,
तरसत क्षण क्षण जी रे,
भिनसर से आये ना बलमा...


-विश्व दीपक

Monday, February 07, 2011

बतियाँ बनाओ न जी


रास न आए मोहे खाली खाली रतियाँ,
बतियाँ बनाओ न जी, आके करो बतियाँ...

साज सुहाए ना हीं, बोल हीं भाए मोहे,
कैसे रचूँ गीत सखी! कैसे लिखूँ पतियाँ..

पतियाँ न भेजे पिया, दरश दिखाए ना हीं,
जाने कैसे धड़के है, दोनों हीं की छतियाँ..

बैठी जाए छाती मोरी, सूजी जाए अखियाँ,
रास न आए मोहे खाली खाली रतियाँ...

बतियाँ बनाओ न जी, आके करो बतियाँ..


-विश्व दीपक

तुम बात करो तो


तुम बात करो तो गुण बरसे,
हम बात करें तो घुन बरसे?

अरे वाह रे मेरे लीलाधर,
यह नई कौन-सी चाल? सखे!
जो खुद को गेहूँ कहते हो,
पर हो गेहुँअन के लाल... सखे!

कई आस्तीनों से गुजरे हो,
हो साथ मेरे फिलहाल, सखे!
है ज्ञात मुझे कि तुम क्या हो,
जो कहूँ, आए भूचाल, सखे!

जो उर्वर को ऊसर कर दे,
तुम ऐसे खर-पतवार, सखे!
हाँ आज गिरा दूँगा तुमको,
हर के जिह्वा की धार, सखे!

सच यही है... ओ वाचाल सखे!!

फिर कहना कहाँ हैं कीड़ें वो,
थे मौन.. मगर तुम्हें सुन, बरसे,
मौनसून-सी जिनकी धुन बरसे!

तुम बात करो तो गुण बरसे?
हम बात करें तो घुन बरसे?


-विश्व दीपक

Wednesday, January 26, 2011

जीत राष्ट्र की


शनै: शनै: बढते जाएँगे,
हम अंबर पर चढ जाएँगे,
यही सोच थी, सही सोच थी,
कि हम जब भी कदम धरेंगे
कण-कण पर अधिकार करेंगे,
गढ जाएँगे मूर्त्ति विजय की,
नाम स्वर्ण में मढ जाएँगे।

होना था सब कुछ ऐसे हीं...
लेकिन विगत एकसठ वर्षों में,
भूल हुई बस एक यही कि
चढने को हमने ठाना जब
दलन किया अपने लोगों का,
बना लिया सोपान उन्हीं को
जो कि पथ में साथ रहे थे,
बनकर हर पल हाथ रहे थे।

कहाँ स्वप्न थे समष्टि के,
और कहाँ व्यष्टि पर अटके,
चढते कब, जब पहले पग पर
हीं हम मूल ध्येय से भटके।

जीत "राष्ट्र" की होती क्यूँकर,
जबकि स्वार्थ में लिप्त हुए हम,
जनना था "सूरज" हमको पर,
चिर-निशा ओढ सुसुप्त हुए हम।

अब भी लुटा सर्वस्व नहीं है,
बहुत कुछ है अब भी शेष,
संभल पड़ें जो इस पल हम तो
सजे लक्ष्य, सँवरे परिवेश।

युग बदला, एक नव-युग आया,
इस युग के बस कुछ दिन गुजरे,
जोश धरें यदि, संभव है कि
भग्नावशेष से अंकुर उभरे।

अत: करें हम दृढ-संकल्प
कि "स्व" ऊपर स्वदेश रखेंगे,
जीत राष्ट्र की करने में हीं
तन-मन-धन अनिमेष रखेंगे।


-विश्व दीपक