सुन!
बावरा हो गया हूँ मैं,
या कह ले
बावरा हूँ मैं।
जिसे पाँच साल
देखा, चाहा, पूजा
उसे हटा चुका हूँ
दिल-दिमाग से
और
तेरी फोटो
आज चुपके से देखी
अलबम में
और
सोचने लगा हूँ तुझे,
तेरे नैन-नक्श,
तेवर, नखरे
सब गढ डाले हैं।
अब
तू हीं कह
शादी करेगी इस बावरे से?
देख!
वह करना चाहता थी
पर......।
बता!
कैसे करेगी शादी.......
यकीन भी कर पाएगी
मुझ पर,
जबकि
मैं भी नहीं करता !!
सच में-
बावरा हूँ मैं,
हूँ ना?
-विश्व दीपक 'तन्हा'
Monday, December 31, 2007
Friday, November 30, 2007
वफ़ा
ऎसी सोहबत पड़ी,
हर तरफ से हीं मुझपर है लानत पड़ी,
मय के आगोश में इस कदर डूबा हूँ,
अब तो नाजुक है मेरी हालत बड़ी।
उनकी काफ़िर निगाहों ने तोड़ा मुझे,
इक झलक देकर आहों से जोड़ा मुझे,
कारवां से उठाकर तन्हाई दी,
हर पहर जाम की है जरूरत पड़ी।
हूर-ए-जन्नत कहकर नवाजा उन्हें,
हर कदम हम-कदम-सा चाहा उन्हें,
यूँ सितम कर सितमगर ठुकरा गए,
अब तो जीने की हर एक चाहत मरी।
वो तो है बेवफ़ा, उसने की है ज़फ़ा,
ये मेरा यार मुझसे है करता वफ़ा,
इस जहां की नज़र में यह कुछ भी रहे,
मेरी आँखों में इसकी है इज़्ज़त बड़ी।
दर्द-ए-दिल कितना भी दबाता हूँ पर,
जाम के साथ ये तो छलक जाता है,
हर जख्म को मिटा दूँगा वादा है यह,
इस जिगर को मिले तो मोहलत बड़ी।
है खुदा तुमसे मुझको बस इतनी गिला,
है दिया क्यों इबादत का ऎसा सिला,
संगमरमर पर कालिख ऎसी पुती,
मुँह छिपाकर किनारे है कुदरत खड़ी।
ऎसी सोहबत पड़ी,
हर तरफ से हीं मुझपर है लानत पड़ी,
क्या कहूँ दोस्तों अपने बारे में मैं,
अब तो खुद से हीं मुझको है नफ़रत बड़ी।
-विश्व दीपक 'तन्हा'
हर तरफ से हीं मुझपर है लानत पड़ी,
मय के आगोश में इस कदर डूबा हूँ,
अब तो नाजुक है मेरी हालत बड़ी।
ऎसी सोहबत पड़ी........
उनकी काफ़िर निगाहों ने तोड़ा मुझे,
इक झलक देकर आहों से जोड़ा मुझे,
कारवां से उठाकर तन्हाई दी,
हर पहर जाम की है जरूरत पड़ी।
ऎसी सोहबत पड़ी........
हूर-ए-जन्नत कहकर नवाजा उन्हें,
हर कदम हम-कदम-सा चाहा उन्हें,
यूँ सितम कर सितमगर ठुकरा गए,
अब तो जीने की हर एक चाहत मरी।
ऎसी सोहबत पड़ी........
वो तो है बेवफ़ा, उसने की है ज़फ़ा,
ये मेरा यार मुझसे है करता वफ़ा,
इस जहां की नज़र में यह कुछ भी रहे,
मेरी आँखों में इसकी है इज़्ज़त बड़ी।
ऎसी सोहबत पड़ी.......
दर्द-ए-दिल कितना भी दबाता हूँ पर,
जाम के साथ ये तो छलक जाता है,
हर जख्म को मिटा दूँगा वादा है यह,
इस जिगर को मिले तो मोहलत बड़ी।
ऎसी सोहबत पड़ी......
है खुदा तुमसे मुझको बस इतनी गिला,
है दिया क्यों इबादत का ऎसा सिला,
संगमरमर पर कालिख ऎसी पुती,
मुँह छिपाकर किनारे है कुदरत खड़ी।
ऎसी सोहबत पड़ी,
हर तरफ से हीं मुझपर है लानत पड़ी,
क्या कहूँ दोस्तों अपने बारे में मैं,
अब तो खुद से हीं मुझको है नफ़रत बड़ी।
-विश्व दीपक 'तन्हा'
Saturday, October 27, 2007
तेरी आँखों में आसमां
तेरी आँखों में आसमां आकर यूँ भर गया,
तूने उठाई पलकें जो, सूरज सँवर गया।
तारों के तार बुन रही पलकों के कोर पर,
उस चाँदनी का हुस्न, गिरकर निखर गया।
चिलमन से छन-छनकर,
मुझको निहारती,
तेरी इस रोशनी से मैं
जी-जीकर मर गया,
तूने उठाई पलकें जो, सूरज सँवर गया।
कुहरे-सा एक-एक पल,
तेरे करीब में,
वक्त की सड़क पर यूँ
जम कर बिखर गया,
तूने उठाई पलकें जो, सूरज सँवर गया।
अलकों में रातरानी,
भौंह पर यह रात फ़ानी,
गालों पर आसमानी
सिंदुर की कहानी।
दर्पण थमा-थमाकर,
मेरी निगाह को,
सीसे-सा तेरा नूर तो
कई रूप धर गया,
तूने उठाई पलकें जो, सूरज सँवर गया।
ओठों पर भर-भराकर,
तुम्हारे लोच से
क्षितिज से टूटकर वो
इन्द्रधनक उतर गया,
तूने उठाई पलकें जो, सूरज सँवर गया।
गरदन पर धूप मानी,
कांधों पर छांव दानी,
कटि पे बे-म्यानी
तलवार की निशानी।
नख-शिख यूँ रूमानी तुझे देखकर शायद,
जहां का हरेक शय,तुझमें हीं जड़ गया,
तेरी आँखों में आसमां आकर यूँ भर गया,
तूने उठाई पलकें जो , सूरज सँवर गया।
तूने उठाई पलकें जो, सूरज सँवर गया।
तारों के तार बुन रही पलकों के कोर पर,
उस चाँदनी का हुस्न, गिरकर निखर गया।
चिलमन से छन-छनकर,
मुझको निहारती,
तेरी इस रोशनी से मैं
जी-जीकर मर गया,
तूने उठाई पलकें जो, सूरज सँवर गया।
कुहरे-सा एक-एक पल,
तेरे करीब में,
वक्त की सड़क पर यूँ
जम कर बिखर गया,
तूने उठाई पलकें जो, सूरज सँवर गया।
अलकों में रातरानी,
भौंह पर यह रात फ़ानी,
गालों पर आसमानी
सिंदुर की कहानी।
दर्पण थमा-थमाकर,
मेरी निगाह को,
सीसे-सा तेरा नूर तो
कई रूप धर गया,
तूने उठाई पलकें जो, सूरज सँवर गया।
ओठों पर भर-भराकर,
तुम्हारे लोच से
क्षितिज से टूटकर वो
इन्द्रधनक उतर गया,
तूने उठाई पलकें जो, सूरज सँवर गया।
गरदन पर धूप मानी,
कांधों पर छांव दानी,
कटि पे बे-म्यानी
तलवार की निशानी।
नख-शिख यूँ रूमानी तुझे देखकर शायद,
जहां का हरेक शय,तुझमें हीं जड़ गया,
तेरी आँखों में आसमां आकर यूँ भर गया,
तूने उठाई पलकें जो , सूरज सँवर गया।
-विश्व दीपक 'तन्हा'
Thursday, September 20, 2007
उरज
तन-उपवन के दो पनघट में, हैं रस के गागर भरे-भरे,
प्रतिपल पल्लवित इन पुष्पों के हर श्रृंगार हैं हरे-हरे,
ज्यों मृदुल मनोरम मलयों-से हैं उर पर पयोधि जड़े-जड़े,
मन-मदन को हर क्षण हर्षाते, कालिंदी-कूल कदंब ये बड़े-बड़े।
गर्वित इन वलयों के मानिंद, विधि-गेह मिलिंद की सुषमा है,
कृश-तनु पर धारित धरणी में, शत-शत रवियों की ऊष्मा है,
देवदारू-विटपों-सा अविचल शिखरों की श्यामल गरिमा है,
मानस के मुक्तों-सा मधुमय , मणि-मज्जित इसकी महिमा है।
निज गेह की अनुकृति निरख रहा, सप्तयति व्योम में भयभीत-सा,
वह नीलाम्बर निर्दोष हुआ, गौर-वर्ण जो सम्मुख गर्वित-सा,
शशि श्यामल होकर शोभित है, लगे श्वेत-रंग भी कल्पित-सा,
द्वि-व्योम धरे हैं चारू-चंद्र , जहाँ वितत व्योम है विस्तृत-सा।
कल-कल जल के तनु-सरवर में, सरसिज मनसिज-सा पुष्पित है,
उर पर उद्धृत पद्माकर में, द्वि-अब्ज पत्र-सा प्लावित है,
कलियों की कोमल काया पर, अधर-नेत्र अलिवृंद मोहित है,
तरूण-उपवन में मुखरित यह मदन, यौवन कानन में सिंचित है।
भव-भावों , प्रीत-पड़ावों से , हुआ हरित-हृदय स्पंदित जब,
धड़कन की ध्वनि पर धमनी हुई, लख कांत-प्रेम कल्लोलित जब,
लगे मंत्रमुग्ध-से मूर्त्त-अमूर्त्त, हुआ श्वासोच्छास सुवासित जब,
लिय तड़ित-तेज़ द्वि-तुहिनों मे, हुआ उर से उरज स्फुटित तब।
प्रतिपल पल्लवित इन पुष्पों के हर श्रृंगार हैं हरे-हरे,
ज्यों मृदुल मनोरम मलयों-से हैं उर पर पयोधि जड़े-जड़े,
मन-मदन को हर क्षण हर्षाते, कालिंदी-कूल कदंब ये बड़े-बड़े।
गर्वित इन वलयों के मानिंद, विधि-गेह मिलिंद की सुषमा है,
कृश-तनु पर धारित धरणी में, शत-शत रवियों की ऊष्मा है,
देवदारू-विटपों-सा अविचल शिखरों की श्यामल गरिमा है,
मानस के मुक्तों-सा मधुमय , मणि-मज्जित इसकी महिमा है।
निज गेह की अनुकृति निरख रहा, सप्तयति व्योम में भयभीत-सा,
वह नीलाम्बर निर्दोष हुआ, गौर-वर्ण जो सम्मुख गर्वित-सा,
शशि श्यामल होकर शोभित है, लगे श्वेत-रंग भी कल्पित-सा,
द्वि-व्योम धरे हैं चारू-चंद्र , जहाँ वितत व्योम है विस्तृत-सा।
कल-कल जल के तनु-सरवर में, सरसिज मनसिज-सा पुष्पित है,
उर पर उद्धृत पद्माकर में, द्वि-अब्ज पत्र-सा प्लावित है,
कलियों की कोमल काया पर, अधर-नेत्र अलिवृंद मोहित है,
तरूण-उपवन में मुखरित यह मदन, यौवन कानन में सिंचित है।
भव-भावों , प्रीत-पड़ावों से , हुआ हरित-हृदय स्पंदित जब,
धड़कन की ध्वनि पर धमनी हुई, लख कांत-प्रेम कल्लोलित जब,
लगे मंत्रमुग्ध-से मूर्त्त-अमूर्त्त, हुआ श्वासोच्छास सुवासित जब,
लिय तड़ित-तेज़ द्वि-तुहिनों मे, हुआ उर से उरज स्फुटित तब।
-विश्व दीपक
Saturday, September 08, 2007
रहबर
गाहे-बगाहे मेरी राहों से जब तुम गुजरती हो,
मुकाम चल पड़ते हैं, जिस ओर रूख करती हो।
दर्पण छिला-छिला है,
दीवार अनसुने हैं,
पलछिन छिने हुए हैं,
लम्हें गिने-चुने हैं,
जो तुम नहीं तो देखो
तन्हाई हीं बुने हैं,
अघोर मेरे घर में
ये सपने हुए दुने हैं-
तुम चौखट से मेरे जाने कब घर में उतरती हो,
मुकाम चल पड़ते हैं , जिस और रूख करती हो।
पत्थर-कलेजा लेकर
इंसान कर दिया है,
ईमान ने तेरे मुझे
बदगुमान कर दिया है,
मेरी रूह को कभी का
हमनाम कर दिया है,
बाहों को तेरे जबसे
दरम्यान कर दिया है,
रिश्ते का रूप लेकर हीं रहबर तुम संवरती हो,
मुकाम चल पड़ते हैं, जिस ओर रूख करती हो।
मुकाम चल पड़ते हैं, जिस ओर रूख करती हो।
दर्पण छिला-छिला है,
दीवार अनसुने हैं,
पलछिन छिने हुए हैं,
लम्हें गिने-चुने हैं,
जो तुम नहीं तो देखो
तन्हाई हीं बुने हैं,
अघोर मेरे घर में
ये सपने हुए दुने हैं-
तुम चौखट से मेरे जाने कब घर में उतरती हो,
मुकाम चल पड़ते हैं , जिस और रूख करती हो।
पत्थर-कलेजा लेकर
इंसान कर दिया है,
ईमान ने तेरे मुझे
बदगुमान कर दिया है,
मेरी रूह को कभी का
हमनाम कर दिया है,
बाहों को तेरे जबसे
दरम्यान कर दिया है,
रिश्ते का रूप लेकर हीं रहबर तुम संवरती हो,
मुकाम चल पड़ते हैं, जिस ओर रूख करती हो।
-विश्व दीपक 'तन्हा'
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