Friday, June 29, 2007

तेरे कारण

शब जला है,
सब जला है,
बाअदब रब जला है,
चाँद के सिरहाने-
आसमां का लब जला है।

तेरी आँखों की अंगीठी
में गले जब नींद मीठी,
भाप बनकर ख्वाब,छनकर,
तारों की हवेलियों में,
अर्श पर तब-तब जला है।

कल शबनमी शीतलपाटी,
रात भर घासों ने काटी,
गुनगुनी बोली से तेरी,
हवाओं के तलवे तले,
सुबह ओस बेढब जला है।

जब इश्क के साहिलों पर,
आई तू परछाई बनकर,
दरिया के दरीचे से फिर,
झांकती हर रूह का
हर तलब बेसबब जला है।

तेरे दर तक की सड़क में,
नैन गाड़, बेधड़क ये,
वस्ल के पैरोकार-सा,
रोड़ों पर कोलतार-सा,
होश का नायब जला है।

शब जला है,
सब जला है,
तेरे दीद के लिए हीं,
चाँद के सिरहाने-
आसमां का लब जला है।

-विश्व दीपक 'तन्हा'

9 comments:

Anupama Chauhan said...

Sabse pehele to yah kahena chahungi ki...is kavita me imaginations bahut aache aur anoothe use kiye hain aapne...ise gaya bhi khoobi se ja asakta hai.....iski har line mujh epasand hai.....shabdon ka prayon bhi manmohak hai

विकास कुमार said...

aapne to alankaaron ki varshaa hi kar di. lay bhi har pal hamare saath rahta hai. adbhut kavitaa likhi hai aapne. badhaai.

शैलेश भारतवासी said...

वाह-वाह करने के अलावा कोई अन्य विकल्प सूझ नहीं रहा है। आपकी सोची हुई पंक्तियाँ तो मेरे लिए कल्पनातीत हैं। ख़ासतौर पे-

चाँद के सिरहाने-
आसमां का लब जला है।

रंजू said...

जब इश्क के साहिलों पर,
आई तू परछाई बनकर,
दरिया के दरीचे से फिर,
झांकती हर रूह का
हर तलब बेसबब जला है।


aapka likha hamesha se achha lagata hai ..bahut hi sundar likha hai ..

BiDvI said...

वाह क्या ख़ूब लिखी है ...
हर एक शब्द , हर एक पंक्ति इतनी ख़ूबसूरत है कि ...
कुछ भी फूटे नही फूट रहा है ...
अदभुत , आ-विचारणीय , अनोखी शब्दावली से आपने प्रेम कि पीर का वर्णन किया है ...
इसके लिए आपको बधाई !!!

Sarvesh said...

iss kavita ki adbhutta ko sabdon main kehna mere vass main nahi,
aapki harr ikk bhavnaoon ko apna salaam....

गौरव सोलंकी said...

आपसे ईर्ष्या होने लगी है...
मन करता है कि इसे मैं लिखता...
मेरी पसंद की पंक्तियाँ ये हैं-
शब जला है,
सब जला है,
बाअदब रब जला है,
चाँद के सिरहाने-
आसमां का लब जला है।

तेरी आँखों की अंगीठी
में गले जब नींद मीठी,
भाप बनकर ख्वाब,छनकर,
तारों की हवेलियों में,
अर्श पर तब-तब जला है।

कल शबनमी शीतलपाटी,
रात भर घासों ने काटी,
गुनगुनी बोली से तेरी,
हवाओं के तलवे तले,
सुबह ओस बेढब जला है।

जब इश्क के साहिलों पर,
आई तू परछाई बनकर,
दरिया के दरीचे से फिर,
झांकती हर रूह का
हर तलब बेसबब जला है।

तेरे दर तक की सड़क में,
नैन गाड़, बेधड़क ये,
वस्ल के पैरोकार-सा,
रोड़ों पर कोलतार-सा,
होश का नायब जला है।

शब जला है,
सब जला है,
तेरे दीद के लिए हीं,
चाँद के सिरहाने-
आसमां का लब जला है।

Gaurav Shukla said...

"बाअदब रब जला है,"

क्या बात है दीपक जी...

"रोड़ों पर कोलतार-सा,
होश का नायब जला है।"

प्रशंसा के सारे शब्द समाप्त हो गये हैं श्रीमन्... बहुत सुन्दर
सुन्दर शब्द चयन, और उनका अनूठा प्रयोग मोहित करने वाला है
आनन्द

सस्नेह
गौरव शुक्ल

alokadvin said...

prakriti aur shringar ras ka aisa sundar mishran maine pehle kabhi nahin dekha VD Bhai...Main jitna kuchh bhi samajh paya usmen chand ki sheetalta tale raat ki jalan ko puri kavita men mahsus kiya...

Thank you for writting such a nice poem.